पार्टी अध्यक्ष रबी लामिछाने की राजनीतिक शक्ति और कमान अपनी ही पार्टी के भीतर लगभग शून्य की स्थिति में पहुंच गई है। सरकार में शामिल मंत्रियों ने उनके निर्देशों को पूरी तरह से नजरअंदाज करना शुरू कर दिया है, जबकि प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने भी उन्हें कोई खास महत्व नहीं दिया है।

लामिछाने की क्षीण होती राजनीतिक शक्ति का स्पष्ट प्रमाण हाल ही के उपसभापति चुनाव में देखा गया। राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (आरपीपी) को उपसभापति पद देने की उनकी राजनीतिक प्रतिबद्धता विफल रही। इसके विपरीत, प्रधानमंत्री बालेन के सीधे समर्थन से श्रम संस्कृति पार्टी की रूबी ठाकुर ने इस पद पर बाजी मार ली।

पार्टी के भीतर उनके इस अकेलेपन का मुख्य कारण आम जनता के दैनिक जीवन से जुड़ा सहकारी धोखाधड़ी का मामला है। करोड़ों रुपये की जमानत देकर रिहा हुए लामिछाने के खिलाफ आज भी देश की विभिन्न अदालतों में मामले लंबित हैं, जिसने उनकी सार्वजनिक छवि को गंभीर झटका दिया है।

सहकारी मामले के अलावा भी उन पर लगे श्रृंखलाबद्ध आरोपों ने उनके नैतिक आधार को बुरी तरह से नष्ट कर दिया है। पासपोर्ट का दुरुपयोग, नागरिकता विवाद, शालिकराम आत्महत्या मामला, कांतिपुर कांड, जबरन वसूली पत्रकारिता का आरोप और पहली पत्नी के साथ तलाक जैसे गंभीर विवाद उनका लगातार पीछा कर रहे हैं।

इन्हीं नैतिक संकटों के कारण पार्टी के सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी लामिछाने उच्च कमान बनाए रखने में सफल नहीं हो सके हैं। दूसरी ओर, सरकार के संचालन में प्रधानमंत्री बालेन का एकाधिकार नियंत्रण स्थापित हो गया है और पूरा मंत्रिमंडल पूरी तरह से प्रधानमंत्री के प्रति ही वफादार नजर आ रहा है।

सांसदों का समीकरण और मनोविज्ञान भी लामिछाने के खिलाफ खड़ा है। अधिकांश सांसदों ने अपनी चुनावी जीत का मुख्य श्रेय बालेन के नाम और उनके द्वारा बनाए गए राजनीतिक माहौल को दिया है। इसी कारण सांसदों की वफादारी भी पार्टी अध्यक्ष से ज्यादा प्रधानमंत्री बालेन की ओर झुक गई है।

एक तरफ पार्टी के भीतर खोई हुई साख और दूसरी तरफ सहकारी तथा पासपोर्ट मामलों में अदालत द्वारा दोषी ठहराए जाने के उच्च जोखिम ने लामिछाने पर गंभीर मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक दबाव पैदा कर दिया है। यदि वह कानूनी रूप से दोषी ठहराए जाते हैं, तो इससे उनके राजनीतिक भविष्य पर पूर्ण विराम लगने की संभावना बढ़ गई है।

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