काठमांडू में राष्ट्रीय एकता दल द्वारा आयोजित एक विशेष संवाद कार्यक्रम में वक्ताओं ने नेपाल को फिर से हिंदू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने के लिए जनमत संग्रह कराने का प्रस्ताव रखा है। "हिंदू राष्ट्र बहाली और संविधान संशोधन" विषय पर आयोजित इस चर्चा में राजनीतिक और बौद्धिक क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों ने हिस्सा लिया और वर्तमान संवैधानिक ढांचे में बदलाव की आवश्यकता बताई।

पार्टी अध्यक्ष विनय यादव की अध्यक्षता में हुए इस कार्यक्रम में राजनीतिक विश्लेषक सत्यनारायण मंडल ने कहा कि वर्ष 2072 के संविधान की प्रस्तावना में मधेश आंदोलन को उचित स्थान नहीं मिला है। उन्होंने समावेशिता के सिद्धांतों को मजबूत करने के लिए संविधान की 100 से अधिक धाराओं की समीक्षा करने की आवश्यकता पर बल दिया।

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक रितेश त्रिपाठी ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य साझा करते हुए कहा कि 2062-63 के जन आंदोलन की मूल मांगों में धर्मनिरपेक्षता शामिल नहीं थी, बल्कि इसे बाद में अंतरिम संविधान के माध्यम से लागू किया गया। उन्होंने जोर देकर कहा कि कोई भी संवैधानिक संशोधन बाहरी दबाव के बजाय विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय हितों और जनभावनाओं के आधार पर होना चाहिए।

चर्चा के दौरान वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि राज्य ने राष्ट्रीय पहचान और सनातन संस्कृति से जुड़ी जनभावनाओं का सम्मान नहीं किया, तो भविष्य में जन-आंदोलन की स्थिति बन सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि हिंदू राष्ट्र और संविधान संशोधन का मुद्दा केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक आम सहमति और जनमत से जुड़ा एक अत्यंत संवेदनशील विषय है।