एसबी शाह - आज भाद्र २३ गते, 'जेन-जी आंदोलन' के एक वर्ष पूरे होने के अवसर पर सरकार ने सार्वजनिक अवकाश दिया है। देश में व्याप्त कुव्यवस्था, भ्रष्टाचार और राजनीतिक सिंडिकेट के खिलाफ युवा पीढ़ी द्वारा उठाए गए इस विद्रोह ने नेपाली राजनीति में युगंतकारी परिवर्तन तो लाया, लेकिन इसके द्वारा छोड़े गए कुछ गंभीर घाव और नकारात्मक संदेश भी उतने ही चिंताजनक हैं।
आंदोलन की सकारात्मक उपलब्धियां
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नागरिक सर्वोच्चता की स्थापना: भौतिक संपत्ति को चाहे जितना नुकसान हो, सेना को अपने ही नागरिकों पर गोली नहीं चलानी चाहिए और नागरिकों की सुरक्षा ही पहला कर्तव्य है, यह अभूतपूर्व नजीर इस आंदोलन ने स्थापित की।
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नया नेतृत्व और तीव्र विकास: आंदोलन के बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में चुनावी सरकार का गठन हुआ। उसी सरकार द्वारा कराए गए चुनाव के माध्यम से बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में नई जन-निर्वाचित सरकार बनी, जो अब देश को तीव्र विकास और प्रशासनिक सुधार की नई दिशा में आगे बढ़ा रही है।
आंदोलन की नकारात्मक छाया और गंभीर प्रश्न
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सुरक्षा निकायों का मनोबल और संवैधानिक दायित्व: संसद भवन जैसी राज्य की धरोहर को बचाने के क्रम में पुलिस को गोली चलानी पड़ी, जिससे पुलिस पर हत्या का आरोप लगा। इसने भविष्य में होने वाले आंदोलनों में सुरक्षाकर्मियों द्वारा राज्य की संपत्ति बचाने या सिंहदरबार के दरवाजे खोल देने पर गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया है।
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भीड़तंत्र और हिंसक गतिविधियां: उत्तेजित भीड़ द्वारा पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा और विदेश मंत्री आरजू देउबा पर की गई निर्मम पिटाई तथा नेताओं के घरों में हुई लूटपाट और आगजनी ने कानून हाथ में लेने की अराजक प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया। हालांकि, गगन थापा के घर से लूटे गए अधिकांश सामान को कुछ दिनों बाद पुलिस बरामद कर वापस लाने में सफल रही।
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ऐतिहासिक धरोहर और राष्ट्रीय संपत्ति का विनाश: सिंहदरबार, सर्वोच्च अदालत और संसद भवन को जला दिया गया, जबकि सुगौली संधि से जुड़े ऐतिहासिक दस्तावेज भी आग में जलकर राख हो गए। जेल ब्रेक कराकर कैदियों का भागना और आंदोलन के दौरान सैकड़ों निर्दोष बच्चों की जान जाना इस विद्रोह का सबसे काला और दर्दनाक पहलू बना।
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सत्ता परिवर्तन में गैर-राजनीतिक प्रभाव: तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देने के लिए मजबूर करने में सेना की भूमिका होने का आरोप लगा, जिसने लोकतांत्रिक प्रणाली में एक गलत नजीर कायम की।
कविता में आंदोलन का प्रतिबिंब
यह कविता इस आंदोलन द्वारा लाए गए तूफान, इसकी उपलब्धियों और इसके द्वारा छोड़े गए घावों को स्पष्ट रूप से उजागर करती है:
आज वही दिन है—
संसद भवन ध्वस्त होने का दिन,
सिंहदरबार आग की लपटों में घिरने का दिन,
सर्वोच्च अदालत भी सुरक्षित न रहने का दिन।
हत्या के आरोपियों के भाग निकलने का दिन,
शीतल निवास जलाए जाने का दिन,
नेताओं के घर-आंगन तक आग पहुंचने का दिन,
वर्षों की कमाई पल भर में राख हो जाने का दिन।
सेना के घेरे में हत्यारों और भ्रष्टाचारियों के बचने का दिन,
बहादुर भाई के सड़क पर पिटने का दिन,
भाभी द्वारा भी हिंसा सहने का दिन,
गगन का घर कुछ दिनों के लिए लूटपाट का निशाना बनने का दिन।
सिंहदरबार के भीतर के इतिहास के पन्ने और
सुगौली संधि से जुड़े दस्तावेज भी आग में झुलसने का दिन,
तीस वर्षों के बाद देश के फिर से नए रास्ते पर चलने के दावे का दिन,
काले चश्मे, फेसबुक स्टेटस और सोशल मीडिया के नारों से देश चलाने के युग की शुरुआत का दिन।
लेकिन यही दिन
सैकड़ों बच्चों की जान जाने का दर्दनाक दिन भी है।
किसी के लिए सेना की शान बढ़ने का दिन,
किसी के लिए राष्ट्र का मान ऊंचा होने का दिन,
किसी के लिए जेल के दरवाजे टूटने का दिन,
और किसी के लिए सनरूफ गाड़ी में नई यात्रा शुरू होने का दिन।
इतिहास इस दिन को कैसे याद रखेगा—
फैसला आज नहीं, समय करेगा।
निःसंदेह, जेन-जी आंदोलन ने दशकों से चली आ रही राजनीतिक कुव्यवस्था पर करारा प्रहार करते हुए देश को नया नेतृत्व तो दिया, लेकिन इस दौरान हुई अराजकता और मानवीय क्षति ने भारी कीमत मांगी है। सोशल मीडिया के नारों और स्टेटस के भरोसे देश चलाने की परिपाटी से ऊपर उठकर विधि, कानून और सुशासन की नींव पर देश का निर्माण करना ही अब वास्तविक चुनौती है।