पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने 207 सीटों पर जीत दर्ज कर पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया है, जबकि 15 वर्षों से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस मात्र 80 सीटों पर सिमट गई है। इस चुनाव में न केवल ममता की पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, बल्कि वे स्वयं भी अपनी सीट नहीं बचा सकीं।

नतीजों के बाद कोलकाता में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान ममता बनर्जी ने कड़ा रुख अपनाते हुए इस्तीफे से इनकार कर दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि करीब 100 सीटों पर धांधली की गई है। साथ ही, उन्होंने दावा किया कि मतगणना केंद्र पर उनके साथ शारीरिक बदसलूकी की गई और उन पर हमला हुआ। ममता ने स्पष्ट किया कि वे पद से इस्तीफा नहीं देंगी, जिससे शनिवार को होने वाले बीजेपी के शपथ ग्रहण समारोह पर संशय के बादल मंडराने लगे हैं।

संविधान विशेषज्ञों के अनुसार, यदि कोई मुख्यमंत्री हार के बाद पद छोड़ने से मना कर देता है, तो ऐसी स्थिति के लिए भारतीय संविधान में कोई सीधा उल्लेख नहीं है। हालांकि, विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर मुख्यमंत्री का पद स्वतः समाप्त माना जाता है। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी ने टेलीग्राफ इंडिया से बात करते हुए कहा कि ऐसी स्थिति में अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है।

कुरैशी ने समझाया कि एक ही समय में दो विधानसभाएं या दो मुख्यमंत्री नहीं हो सकते, इसलिए सत्ता के सुचारू हस्तांतरण के लिए कुछ समय के लिए राष्ट्रपति शासन का सहारा लिया जा सकता है। इतिहास में 2005 में बिहार में भी ऐसी ही स्थिति देखी गई थी जब काफी समय तक राष्ट्रपति शासन लागू रहा था। अब सभी की निगाहें राजभवन और केंद्र सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि बंगाल में संवैधानिक व्यवस्था कैसे बहाल की जाएगी।