पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की राजनीतिक यात्रा कानूनी और नैतिक संकट के मोड़ पर आ खड़ी हुई है। अपनी युवावस्था में राजनीतिक हत्या के आरोप में डेढ़ दशक तक जेल की सजा काटने वाले ओली, अब अपने ही शासनकाल में हुए नरसंहार के मुख्य जिम्मेदार के रूप में देखे जा रहे हैं। सरकार को सौंपी गई उच्च स्तरीय जाँच आयोग की 900 पन्नों की रिपोर्ट ने 'जेनजी' आंदोलन में हुई मौतों के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री ओली को मुख्य दोषी मानते हुए फौजदारी मुकदमा चलाने की सिफारिश की है। इससे मुलुकी अपराध संहिता-2074 के तहत जाँच का रास्ता साफ हो गया है, जिससे उनकी फिर से गिरफ्तारी की संभावना प्रबल हो गई है।
आयोग के निष्कर्ष और नेतृत्व पर संकट
आंदोलनकारियों और सरकार के बीच हुए 10-सूत्रीय समझौते के आधार पर गठित इस आयोग ने रविवार को प्रधानमंत्री सुशीला कार्की को रिपोर्ट सौंपी। पूर्व न्यायाधीश गौरी बहादुर कार्की के नेतृत्व वाली टीम ने निष्कर्ष निकाला है कि घटना के दौरान सरकारी शक्ति का घोर दुरुपयोग हुआ।
रिपोर्ट मुख्य रूप से 8 सितंबर को नया बानेश्वर में हुई घटना पर केंद्रित है, जहाँ पुलिस की गोलीबारी में 21 नागरिकों की जान गई थी। जाँच के अनुसार, तत्कालीन पीएम ओली और काठमांडू के सीडीओ छबीलाल रिजाल इसके लिए सीधे तौर पर जवाबदेह हैं। 'वॉकी-टॉकी' के जरिए सीधे गोली चलाने का आदेश देने के मामले में तत्कालीन गृहमंत्री रमेश लेखक और आईजीपी को भी कानूनी दायरे में लाने का सुझाव दिया गया है। पूरे आंदोलन में प्रदर्शनकारियों और कैदियों सहित कुल 76 लोगों की मौत हुई थी।
विद्रोह का अतीत और 14 साल का जेल जीवन
ओली के मौजूदा संकट को समझने के लिए उनके इतिहास को देखना जरूरी है। 1971 के आसपास 'झापा विद्रोह' के दौरान ओली पर 'वर्ग शत्रु' के खात्मे के नाम पर धर्मप्रसाद ढकाल और उनके बेटे की हत्या का आरोप लगा था। इस जुर्म में उन्हें 1973 में गिरफ्तार किया गया और उन्होंने 1987 तक लगातार 14 साल विभिन्न जेलों के 'गोलघर' में बिताए। जेल से छूटने के बाद ही उन्होंने हिंसा का रास्ता छोड़कर शांतिपूर्ण राजनीति अपनाई थी।
जवाबदेही की परीक्षा
अतीत में राजनीतिक बदलाव के नाम पर हुई हत्याओं के लिए जेल जाने वाले ओली, आज लोकतांत्रिक व्यवस्था में नागरिकों की जान लेने के आदेश के जिम्मेदार ठहराए गए हैं। यदि सरकार आयोग की सिफारिश मानती है, तो ओली को फिर से सलाखों के पीछे जाना पड़ सकता है। यह मामला नेपाल में शक्तिशाली नेताओं की जवाबदेही तय करने के लिए एक मिसाल बनेगा।