मुझे किसी समय कुमार बेन द्वारा बताई गई एक घटना याद आती है— "बालेन के बारे में कंटेंट बनाकर कई नए मीडिया, यूट्यूबर्स और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स आर्थिक रूप से कंटेंट को मोनेटाइज करके अपना जीवनयापन कर रहे हैं।" आज देश के प्रधानमंत्री के अमेरिका रवाना होने के दृश्यों को देखते हुए ऐसा लगता है कि उनकी यह यात्रा किसी गंभीर कूटनीतिक दौरे की तुलना में 'कंटेंट क्रिएशन' का एक महाउत्सव अधिक बनकर रह गई।

हमने कैमरे के लेंस से सब कुछ स्पष्ट देखा— अंतरराष्ट्रीय टर्मिनल में प्रवेश का दृश्य, प्रधानमंत्री की गाड़ी का सीधे रनवे पर विमान तक पहुँचने का तामझाम, कतर एयरवेज पर चढ़ते समय का शॉट, और दोहा हवाई अड्डे पर भव्य स्वागत तथा ट्रांसफर का दृश्य। लेकिन, कैमरे के पर्दे पर छाए इन तमाम दृश्यों के पीछे सवाल जस के तस बने हुए हैं। राष्ट्रीय स्वाभिमान की बात करने वाले प्रधानमंत्री ने कम से कम दोहा तक की यात्रा के लिए नेपाल एयरलाइंस को क्यों नहीं चुना? कतर एयरवेज के उस विमान में उन्होंने बिजनेस क्लास की विलासिता चुनी या इकोनॉमी की सादगी, यह पारदर्शी होना चाहिए था। प्रधानमंत्री और उनकी सलाहकार टीम का खुद कंटेंट क्रिएटर बनकर वीडियो जारी करने में व्यस्त रहना लोकतंत्र के लिए शोभा देने वाली बात नहीं है। वीरता, बलिदान और समर्पण का भव्य एवं गौरवशाली इतिहास रखने वाली नेपाली सेना की मर्यादा को दरकिनार करते हुए 'सलामी न लेने' का नाटक करके देश की औपचारिक परंपरा को भूलना उनकी पुरानी स्टंट शैली की ही निरंतरता थी। या फिर नेपाली सेना ने खुद ही प्रधानमंत्री को सलामी देने से इनकार कर दिया था? दुर्गा प्रसाई ने तो सुरक्षा गार्ड से ही सही, सलामी लेकर आत्ममुग्धता का आनंद लिया, प्रधानमंत्री को तो कम से कम देश और सेना के गौरव का ध्यान रखना चाहिए था।

ईमानदारी से कहूँ तो, संयुक्त राष्ट्र संघ के रोस्टम पर खड़े होकर भाषण देते समय मुझे लगा था कि वे अपने पारंपरिक फैशन और अंदाज में किसी वेस्टर्न रैप के बोल गुनगुनाएंगे। लेकिन, मेरी उम्मीदों के विपरीत प्रधानमंत्री ने भाषण बेहद असाधारण और विषय-आधारित ही दिया। अपने संबोधन के दौरान उन्होंने भोटेकोशी और त्रिशूली की बाढ़ व भूस्खलन की आपदा को उजागर करते हुए हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव, क्षतिपूर्ति, जलवायु वित्त यानी क्लाइमेट फाइनेंस तक आसान पहुँच और तकनीक हस्तांतरण के मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया। इसके अलावा, नेपाल के नए राजनीतिक परिदृश्य और युवाओं यानी जेन-जी (Gen-Z) के नेतृत्व में लोकतांत्रिक उभार को वैश्विक मंच पर प्रस्तुत करना उनके भाषण का एक अविस्मरणीय और मजबूत पक्ष था।

हालाँकि, भाषण कितना भी अच्छा क्यों न रहा हो, हॉल में सुनाई दी तालियों और हूटिंग का दृश्य काफी अजीब था। संयुक्त राष्ट्र संघ के सभाकक्ष में हुई वह हूटिंग वास्तव में अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों की थी या खुद बालेन के आसपास मौजूद लोगों की? नेपाल में कम्युनिस्ट अपने नेता की फर्जी लोकप्रियता दिखाने के लिए भीड़ में अपने ही कार्यकर्ताओं को घुसाकर ताली बजवाने और हूटिंग कराने का 'प्रोपेगैंडा' खूब करते हैं। क्या बालेन के सम्मानित सलाहकारों ने भी कम्युनिस्टों की इसी सस्ती प्रोपेगैंडा शैली को कॉपी किया है?

संबोधन के अच्छे पहलुओं को छोड़कर उनके बाहरी आवरण और व्यवहार की ओर देखें तो निराशा ही हाथ लगती है। दोहा के चमचमाते हवाई अड्डे पर उनकी आँखों पर काला चश्मा नहीं था, लगा कि उनकी आँख की बीमारी शायद पूरी तरह ठीक हो गई है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव एंटोनियो गुटेरेस के साथ हाथ मिलाने और फोटो खिंचवाने से ठीक पहले हड़बड़ी में रे-बैन चश्मा निकालकर पहनने का उनका व्यवहार बेहद बचकाना लग रहा था। कहीं प्रधानमंत्री को रे-बैन कंपनी ने ही स्पॉन्सर या पे तो नहीं किया है? फिर यूएन के रोस्टम पर खड़े होकर संबोधन करते समय भी वही काला चश्मा पहने बिना न रह पाने की स्थिति देखकर लगता है कि उनकी आँखें अभी ठीक नहीं हुई हैं; उनकी आँख की बीमारी जल्द ठीक हो, यही कामना है। दूसरी ओर, उनके द्वारा चुनी गई वह काली पोशाक यानी 'ब्लैक आउटफिट' 'अशुभ' का संकेत देती थी, जो देश के प्रधानमंत्री की औपचारिक पोशाक के रूप में मुझे बिल्कुल पसंद नहीं आई।

प्रधानमंत्री जी, यूएन के मंच पर आपने बेहतरीन विषय उठाए, उसके लिए धन्यवाद। लेकिन राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करते समय कम्युनिस्ट शैली का हूटिंग प्रोपेगैंडा, अशुभ काली पोशाक और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में रे-बैन चश्मे के बचकानेपन को छोड़ना ही होगा।

भगवान पशुपतिनाथ सबका कल्याण करें।