काठमांडू — नेपाल सरकार ने प्रेस काउंसिल नेपाल के नियामक अधिकारों का व्यापक विस्तार करने के उद्देश्य से कानून संशोधन से संबंधित एक अध्यादेश राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल के पास प्रमाणीकरण के लिए भेजा है। इस अध्यादेश के माध्यम से पत्रकारों और मीडिया संस्थानों के साथ-साथ डिजिटल कंटेंट क्रिएटर्स तथा सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स को भी पत्रकारिता आचार संहिता के दायरे में लाने का प्रयास किया गया है।

प्रस्तावित अध्यादेश के अनुसार, कोई व्यक्ति चाहे खुद को संचारकर्मी, कंटेंट क्रिएटर, प्रस्तोता या इन्फ्लुएंसर के रूप में प्रस्तुत करे, यदि वह पत्रकारिता से जुड़ा कार्य करता है तो उस पर आचार संहिता लागू होगी। इसके अलावा ऑनलाइन, मोबाइल एप्लिकेशन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, तथा स्वदेशी व विदेशी मीडिया के लिए नेपाल में कार्यरत पत्रकार भी इसके दायरे में आएंगे।

अध्यादेश में यह प्रावधान किया गया है कि मीडिया संस्थानों के संपादकीय नियंत्रण वाले सोशल मीडिया खातों से प्रकाशित या प्रसारित सामग्री की पूरी जिम्मेदारी संबंधित संस्था की ही होगी। आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों के लिए गलती सुधारने, सार्वजनिक रूप से माफी मांगने, बार-बार उल्लंघन करने वाले मीडिया या पत्रकारों की सरकारी सुविधाओं और अनुदान को रोकने की सिफारिश करने तथा उल्लंघनकर्ताओं की सूची सार्वजनिक करने जैसे दंडात्मक प्रावधान रखे गए हैं। हालांकि, निजी सोशल मीडिया खातों के माध्यम से व्यक्त व्यक्तिगत विचारों, राजनीतिक टिप्पणियों, व्यंग्य, कला और साहित्य को इस दायरे से बाहर रखा गया है।

इस बीच, संसदीय प्रक्रिया को दरकिनार कर लाए गए इस अध्यादेश को प्रेस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाला बताते हुए नेपाल पत्रकार महासंघ ने सख्त आपत्ति जताई है। महासंघ ने राष्ट्रपति पौडेल से इस अध्यादेश को प्रमाणित न करने का आग्रह किया है।

मीडिया का मूल सिद्धांत

प्रेस स्वतंत्रता का मूल सिद्धांत यह मानता है कि मीडिया को राज्य के हस्तक्षेप, पुलिस कार्रवाई, कानूनी अड़चनों या नियामक निकायों के भय के बिना पूरी तरह स्वतंत्र होकर समाचार सामग्री प्रसारित करने की आजादी होनी चाहिए। एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में मीडिया की वास्तविक जवाबदेही राज्य के दंडात्मक नियंत्रण पर नहीं, बल्कि जनता के विश्वास पर आधारित होती है: यदि कोई मीडिया संस्थान गलत, असंतुलित या भ्रामक समाचार प्रसारित करता है, तो उसकी अंतिम सजा स्वयं पाठक और जनता देती है, जिससे वह संस्थान अपनी विश्वसनीयता, पाठक वर्ग और व्यवसाय खो बैठता है। लोकतांत्रिक समाज में मीडिया की स्वतंत्रता के मूल मर्म को स्पष्ट करते हुए मीडिया के मूलभूत सिद्धांत का उल्लेख इस प्रकार किया गया है:

"मीडिया को पुलिस, प्रेस काउंसिल या अदालत की संभावित कानूनी अड़चनों और कार्रवाई के निरंतर भय के बिना स्वतंत्र रूप से समाचार सामग्री प्रसारित करने का अधिकार होना चाहिए। एक वास्तविक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि कोई मीडिया संस्थान गलत, असंतुलित या भ्रामक समाचार प्रसारित करता है, तो उसकी अंतिम सजा स्वयं पाठक और जनता देती है। जनता मीडिया से अपना विश्वास वापस ले लेती है, जिसके कारण वह मीडिया संस्थान अपनी विश्वसनीयता, पाठक वर्ग और अंततः अपना व्यवसाय खो देता है। यह प्राकृतिक जन-परीक्षण ही प्रेस का सबसे बड़ा और सबसे प्रभावी नियामक है।"

प्रेस काउंसिल के अधिकार बढ़ाने पर वरिष्ठ संपादक का व्यंग्य

प्रेस काउंसिल को अधिक शक्तिशाली बनाने के सरकारी प्रयासों और अधिकारों में वृद्धि की मांग पर चुटकी लेते हुए एक वरिष्ठ संपादक ने व्यंग्यात्मक शैली में अपनी राय व्यक्त की है।

संपादक ने व्यंग्य करते हुए कहा, "प्रेस काउंसिल को इतना शक्तिशाली बनाया जाना चाहिए कि उसे अदालतों की तरह कानूनी मुकदमा चलाने, पत्रकारों को गिरफ्तार करने और आपराधिक मामलों की जांच करने का अधिकार भी दे दिया जाए। क्योंकि प्रेस काउंसिल विभिन्न विषयों की जांच के लिए नेपाल पुलिस से लगातार आग्रह करती रही है। इसलिए इसे उच्च न्यायालय के समान ही अधिकार दिए जाने चाहिए।"

उक्त संपादक ने लोकतांत्रिक प्रणाली में मीडिया के पूर्णतः स्वतंत्र रहने पर बल देते हुए कहा कि सोशल मीडिया को काउंसिल द्वारा विनियमित नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार प्रेस काउंसिल का मुख्य कार्य व्यावसायिक आचरण, पत्रकारिता की निष्ठा बनाए रखना और प्रेस स्वतंत्रता की वकालत करना ही है। इसके साथ ही, उन्होंने वर्तमान प्रेस काउंसिल पर उत्तर (चीन) से अत्यधिक प्रभावित होने का गंभीर आरोप भी लगाया।