पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली झापा के हैं, जबकि पूर्व अर्थमंत्री विष्णु पौडेल स्यांगजा के हैं। नेकपा (एमाले) की आंतरिक राजनीति में झापा के ओली के अत्यंत विश्वासपात्र माने जाने वाले स्यांगजा के विष्णु पौडेल ने अपना राजनीतिक आधार क्षेत्र रूपन्देही–2 (बुटवल क्षेत्र) को बनाते आए हैं। पार्टी के महासचिव से लेकर बार-बार अर्थमंत्री तक रहे पौडेल पर राष्ट्रीय स्तर के नीतिगत भ्रष्टाचार से लेकर स्थानीय स्तर के विकास निर्माण और सुकुम्बासी समस्याओं तक दर्जनों गंभीर आरोप लगते आए हैं।

 

पूर्व अर्थमंत्री विष्णु पौडेल से जुड़े 10 मुख्य विवाद इस प्रकार हैं:

  1. ललिता निवास भूमि प्रकरण (बालुवाटार भूमि घोटाला)

    यह अब तक विष्णु पौडेल से जुड़ा सबसे बड़ा और गंभीर विवाद है। उन पर भू-माफियाओं के साथ मिलकर राज्य की संपत्ति को निजी नाम पर कराने वाले प्रकरण में सीधे तौर पर जुड़े होने का आरोप है।

    50 हजार प्रति आना का ‘झोल’: वि.सं. 2061 में पौडेल ने बालुवाटार की 8 आना जमीन अपने बेटे नवीन पौडेल के नाम पर मात्र 50 हजार रुपये प्रति आना (कुल 4 लाख रुपये) की सरकारी मूल्यांकन दिखाकर पास कराई थी। इतना कम मूल्य दिखाने का मुख्य उद्देश्य राज्य को देना पड़ने वाला बड़ा कर/राजस्व बचाना और भू-माफिया (शोभाकान्त ढकाल आदि) से नीतिगत निर्णय करवाने के बदले लिए गए ‘कमीशन’ (घूस) को कानूनी आवरण देना था।

    कानूनी उन्मुक्ति: बाद में सीआईबी (CIB) और अख्तियार ने मामला चलाया, तब “जमीन सरकार को वापस करने पर सहमति” वाले कानूनी छिद्र (Legal Loophole) का उपयोग कर उन्हें और उनके बेटे को प्रतिवादी बनाए बिना उन्मुक्ति दी गई। इससे “बड़े को चैन, छोटे को कानून” कहकर आम जनमानस में व्यापक आक्रोश पैदा हुआ।

  2. 2025 का ‘Gen Z’ आंदोलन और जन आक्रोश

    प्रणालीगत भ्रष्टाचार और सरकार द्वारा सोशल मीडिया पर लगाए गए प्रतिबंध के विरोध में सितंबर 2025 में नेपाल में युवाओं के नेतृत्व वाला ‘Gen Z’ आंदोलन तेज हुआ था।

    आक्रोश का निशाना: उस समय उपप्रधान और अर्थमंत्री रहे पौडेल को सत्ताधारी संभ्रांत वर्ग और पुराने भ्रष्ट राजनीतिकों का प्रतीक माना गया, इसलिए वे आंदोलनकारियों के मुख्य निशाने पर आए।

    भौतिक हमले का प्रयास: क्रुद्ध भीड़ ने उनके भैंसेपाटी स्थित निवास पर पत्थरबाजी की, और उन्हें समझकर (गलती से) एक अन्य व्यक्ति को काठमांडू की सड़कों पर दौड़ाकर पीटा था। यह आंदोलन इतना शक्तिशाली था कि इसी दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को इस्तीफा देना पड़ा और सरकार गिर गई। पौडेल को प्रत्यक्ष रूप से मार नहीं पड़ी, लेकिन इससे उनके खिलाफ जनता का आक्रोश किस स्तर का था, यह स्पष्ट होता है। उन्हें ओली के बाद प्रमुख ‘खलपात्र’ के रूप में चित्रित किया गया।

  3. गिरीबन्धु टी-स्टेट भूमि अदला-बदली प्रकरण में विवादास्पद बचाव

    इस प्रकरण में वे सीधे तौर पर शामिल नहीं थे, फिर भी भ्रष्टाचार का पक्षपोषण करने के आरोप में वे बड़े विवाद में घिर गए।

    नीतिगत भ्रष्टाचार का समर्थन: केपी ओली नेतृत्व वाली सरकार ने झापा के गिरीबन्धु टी-स्टेट की जमीन की अदला-बदली की अनुमति देने का निर्णय किया था, जिसे बाद में सर्वोच्च अदालत ने ‘नीतिगत भ्रष्टाचार’ ठहराते हुए रद्द कर दिया।

    पौडेल की भूमिका: अदालत द्वारा भ्रष्टाचार ठहराए जा चुके इतने गंभीर राष्ट्रीय मुद्दे में विष्णु पौडेल ने पार्टी अध्यक्ष ओली के अंधभक्त की तरह सार्वजनिक रूप से कड़ा बचाव किया। उल्टा विपक्षी को माफी मांगनी चाहिए—ऐसी दलील ने, आलोचकों के अनुसार, यह स्पष्ट कर दिया कि वे विधि के शासन से अधिक गुट और भ्रष्टाचार के संरक्षण में लगे हैं।

  4. लुम्बिनी प्रदेश की राजधानी स्थानांतरण विवाद (2020)

    इस विवाद ने उनके अपने गृहजिले और निर्वाचन क्षेत्र में उनकी लोकप्रियता को अचानक घटा दिया।

    मंत्री पद के बदले राजधानी ‘सौदा’ करने का आरोप: पौडेल का मुख्य राजनीतिक आधार क्षेत्र रूपन्देही (बुटवल) है। लेकिन जब लुम्बिनी प्रदेश की राजधानी बुटवल से दांग के भालुवाङ ले जाने का निर्णय हुआ, तो वे चुप रहे। आलोचकों और स्थानीय निवासियों ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया कि केपी ओली की मंत्रिपरिषद में अपना ‘अर्थमंत्री’ पद सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने राजधानी दांग ले जाने पर अंदरूनी सहमति दी।

  5. 2079 के संसदीय चुनाव में मतगणना विवाद (रूपन्देही–2)

    संसदीय अभ्यास में यह उनके लिए एक और बड़ा नैतिक संकट था।

    धांधली का आरोप: सन् 2022 (वि.सं. 2079) के आम चुनाव में राष्ट्रीय स्वतन्त्र पार्टी (रास्वपा) के उम्मीदवार गणेश पौडेल के साथ कड़ी प्रतिस्पर्धा के दौरान एक मतदान केंद्र की मतपेटी में मुचुल्के में दर्ज संख्या से अधिक मतपत्र पाए गए।

    परिणाम: विपक्षियों ने सत्ता और शक्ति के दुरुपयोग से चुनाव में धांधली का आरोप लगाया। मतगणना लंबे समय तक बाधित रही, और बाद में वे कम मतांतर से जीत गए, फिर भी उनकी जीत की निष्पक्षता पर बड़ा प्रश्नचिह्न लग गया।

  6. झुम्सा पेयजल परियोजना की अलपत्र स्थिति

    पौडेल ने अपने मुख्य राजनीतिक आधार क्षेत्र रूपन्देही (बुटवल) में पाल्पा के झुम्सा से पानी लाने की घोषणा किए लगभग तीन दशक बीत चुके हैं।

    विवाद: हर चुनाव में इसी परियोजना को दिखाकर वोट मांगने के बावजूद अब तक झुम्सा पेयजल परियोजना पूरी नहीं हुई। बुटवलवासियों को अभी भी पेयजल की गंभीर कमी झेलनी पड़ रही है, जिससे आलोचकों के अनुसार उनकी ‘विकास-प्रिय’ छवि नकली साबित होती है।

  7. काम पूरा हुए बिना सिद्धबाबा सुरंगमार्ग का ‘ब्रेक थ्रु’ उद्घाटन

    अधूरे काम का उद्घाटन कर श्रेय लेने की जल्दबाजी का आरोप लगाते हुए उनकी आलोचना हुई है।

    विवाद: सिद्धार्थ राजमार्ग के बुटवल–पाल्पा खंड में निर्माणाधीन सिद्धबाबा सुरंगमार्ग के मुख्य टनल का 11 माघ को ‘ब्रेक थ्रु’ हुआ। प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने वर्चुअल माध्यम से उद्घाटन किया, और पौडेल उपप्रधान तथा अर्थमंत्री के रूप में वहां उपस्थित थे। लेकिन टनल कटने के बावजूद सुरंग के अंदर फर्श और दीवार की ढलान (लाइनिंग), विद्युतीकरण, वेंटिलेशन, और बाहर सड़क पर ‘रॉक शेड’ तथा सड़क उन्नयन जैसे काम अब भी बाकी हैं। पूरी सुरक्षा सुनिश्चित हुए बिना राजनीतिक श्रेय लेने की जल्दबाजी का आरोप उन पर है।

  8. खुद ‘नकली सुकुम्बासी’ बनकर लालपुर्जा कब्जाने का आरोप

    सार्वजनिक मंचों पर सुशासन की बात करने वाले पौडेल पर खुद सरकारी जमीन हड़पने का गंभीर आरोप सामने आया।

    विवाद: वि.सं. 2052 में तत्कालीन सरकार ने सुकुम्बासियों को लालपुर्जा बांटने के लिए आयोग बनाया। उस समय रूपन्देही के बुटवल स्थित दीपनगर में पौडेल ने मिट्टी की टाइल लगाकर ऐलानी (सरकारी) जमीन पर घर बनाकर रहना शुरू किया था। एक तरफ उनकी पत्नी के नाम नवलपरासी के रामापुर में 18 कट्ठा जमीन थी, दूसरी तरफ उन्होंने खुद को ‘सुकुम्बासी’ बताकर अपने बेटे नवीन पौडेल के नाम पर दीपनगर की 18 धुर सरकारी जमीन का लालपुर्जा निकलवाया।

  9. ‘टूरिस्ट’ उम्मीदवार होने का आरोप

    स्थानीय स्तर पर यह उनके खिलाफ सबसे बड़ा सामाजिक/राजनीतिक आरोप माना जाता है।

    विवाद: वि.सं. 2016 में स्यांगजा के पुतलीबजार में जन्मे पौडेल वि.सं. 2035 से तत्कालीन माले होते हुए एमाले की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। तीन दशक से अधिक समय तक बुटवल में राजनीतिक आधार होने और वहीं से चुनाव जीतने के बावजूद बुटवल में उनका अपना निजी घर नहीं है। ललितपुर के महंगे भैंसेपाटी आवास क्षेत्र में उनका भव्य घर और संपत्ति है। चुनाव के समय ही बुटवल जाने के कारण विपक्षी उन्हें ‘टूरिस्ट उम्मीदवार’ कहते हैं।

  10. वास्तविक सुकुम्बासियों को सिर्फ आश्वासन (वोट बैंक की राजनीति)

    आरोप है कि खुद नकली सुकुम्बासी बनकर जमीन लेने के बावजूद उन्होंने वास्तविक सुकुम्बासियों को केवल वोट बैंक बनाया।

    विवाद: रूपन्देही–2 में करीब 15 हजार सुकुम्बासी मतदाता हैं। पौडेल हर चुनाव में उन्हें लालपुर्जा देने की प्रतिबद्धता जताते हैं। लेकिन बार-बार सत्ता में रहने और वित्त मंत्री जैसे शक्तिशाली पद पर पहुंचने के बावजूद अब तक उन्हें लालपुर्जा नहीं मिला। इसी कारण हाल के समय में सुकुम्बासी बस्तियों में घर-घर जाकर प्रचार करना उनके लिए काफी कठिन होने लगा है और उन्हें स्थानीय स्तर पर तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा है।