सुनसरी के देवानगंज गाउँपालिका-3, कप्तानगंज में 10 सावन 2083 को सांप्रदायिक झड़प और हिंसक घटना घटी थी। बोलबम यात्रा के डीजे साउंड सिस्टम और मुहर्रम के धार्मिक झंडे को लेकर पूर्व में हुए विवाद से शुरू हुआ तनाव रात 9:45 से 10:05 बजे के बीच बिजली चले जाने की स्थिति में और भी उग्र हो गया था। स्थिति को नियंत्रण में लेने के लिए नेपाल पुलिस ने 3 राउंड और सशस्त्र पुलिस बल ने 22 राउंड मिलाकर कुल 25 राउंड गोलियां चलाईं, जिससे ओमप्रकाश मेहता, जयप्रकाश मेहता और रवींद्र मेहता नामक तीन आम नागरिकों की मौत हो गई। घटना में पुलिस निरीक्षक राकेश राय सहित 22 से 40 नागरिक तथा सुरक्षाकर्मी घायल हुए थे, जबकि 112 घरों/संरचनाओं और 69 वाहनों को नुकसान पहुँचा था।

इस हिंसक घटना की वास्तविक स्थिति का पता लगाने के लिए गृह मंत्री के निर्देश के बाद प्रतिनिधि सभा सदस्य एवं इंजीनियर दीपक कुमार साह की संयोजकता में तैयार की गई स्थलगत अध्ययन रिपोर्ट गृह मंत्रालय में पेश कर दी गई है। इस रिपोर्ट तथा स्थानीय स्तर के आधिकारिक पत्राचारों ने उस क्षेत्र में संचालित धार्मिक संस्थाओं की कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता और सुरक्षा संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

‘सुफ्फा एकेडमी’ और गैर-पंजीकृत मदरसों पर 18-सूत्रीय जाँच

सांसद साह की संयोजकता में तैयार की गई अध्ययन रिपोर्ट के 15वें बिंदु में देवानगंज गाउँपालिका-4 में स्थित "सुफ्फा एकेडमी नेपाल" तथा अन्य मदरसों के बारे में 18 गंभीर अनुसंधान योग्य प्रश्न उठाए गए हैं। स्थानीय स्तर पर उस संस्था के निजी विद्यालय के रूप में पंजीकृत होकर मदरसा संचालित करने या गैर-सरकारी संगठन (NGO) के रूप में पंजीकृत होकर शैक्षणिक संरचना तथा छात्रावास चलाने की आशंका व्यक्त की गई है।

रिपोर्ट में सवाल किया गया है कि वह संस्था किस कानून के तहत पंजीकृत है, उसके पंजीकरण प्रमाणपत्र में उल्लिखित उद्देश्य क्या है, संचालन अनुमति किस निकाय से ली गई है और स्थानीय स्तर तथा शिक्षा विकास एवं समन्वय इकाई में इसका अभिलेख (रिकॉर्ड) है या नहीं। इसके साथ ही, वहाँ अध्ययनरत छात्रों की संख्या, स्थायी पता, राष्ट्रीयता, विदेशी छात्रों और धर्मगुरुओं के नेपाल प्रवेश तथा प्रवास की कानूनी स्थिति, शिक्षकों की नियुक्ति प्रक्रिया, पारिश्रमिक का स्रोत, बैंक खाता, विदेशी सहायता तथा चंदा, और भवन निर्माण के नक्शा स्वीकृति की वैधानिकता के बारे में विस्तृत जाँच करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

गाउँपालिका और जिला प्रशासन का पत्राचार तथा प्रशासनिक कार्रवाई

इसी पृष्ठभूमि में देवानगंज गाउँपालिका की शिक्षा, युवा तथा खेलकूद शाखा ने वडा नंबर 3 में संचालित दारुल उलूम अल-सफा (मदरसा) की कानूनी स्थिति के बारे में सूक्ष्म जाँच शुरू कर दी है। गाउँपालिका के प्रमुख प्रशासकीय अधिकारी बाबूराम घिमिर ने 28 सावन 2083 को चलानी (डिस्पैच) नंबर 00101 के माध्यम से जिला प्रशासन कार्यालय, इनरुवा को पत्र लिखकर आधिकारिक जानकारी दी थी कि उक्त मदरसा देवानगंज गाउँपालिका तथा वडा कार्यालय में पंजीकृत नहीं है।

इसके पश्चात, गाउँपालिका ने 2 भदौ 2083 को चलानी नंबर 00933 के पत्र द्वारा दारुल उलूम अल-सफा (मदरसा) को तीन दिनों के भीतर निम्नलिखित 7 प्रमाणित विवरण प्रस्तुत करने का कड़ा निर्देश दिया था:

  • अध्ययनरत छात्रों के जन्म पंजीकरण की प्रमाणित प्रतिलिपि

  • अध्यापनरत शिक्षकों के नियुक्ति पत्र की प्रमाणित प्रतिलिपि

  • भवन, कक्षा, छात्रावास सहित भौतिक संरचना और भूमि का विवरण

  • पिछले 5 वर्षों की सामाजिक तथा आर्थिक लेखापरीक्षा (ऑडिट) रिपोर्ट

  • विज्ञान प्रयोगशाला, पुस्तकालय और आईसीटी (ICT) लैब की स्थिति

  • शिक्षण-अध्ययन का माध्यम और कक्षावार विषय

  • पंजीकरण तथा संचालन अनुमति या स्वीकृति से संबंधित दस्तावेज़

मांगे गए कानूनी दस्तावेज़ पेश करने में संस्था के असफल रहने के बाद, इसकी वैधानिकता और संचालन के इरादे पर अतिरिक्त संदेह उत्पन्न हो गया है।

विदेशी स्रोत, गैर-कानूनी संरचना और 'दारुल उलूम अल-सुफ्फा' की पृष्ठभूमि

कप्तानगंज में स्थित मस्जिद अल-सुफ्फा तथा बालिका शिक्षा का उद्घाटन 6 फरवरी 2026 को नेपाल के दारुल उलूम अल-सुफ्फा के अध्यक्ष द्वारा किया गया था। उक्त भवन का निर्माण नेपाल के अल-सुफ्फाह शैक्षणिक तथा कल्याणकारी समाज के अध्यक्ष मौलाना अबुल हसन नदवी की देखरेख में संपन्न हुआ था। प्राप्त विवरण के अनुसार, इस दारुल उलूम अल-सुफ्फा के निर्माण के लिए तुर्की और दक्षिण अफ्रीका स्थित एक गैर-सरकारी संगठन द्वारा 1 करोड़ 87 लाख रुपये के बराबर का विदेशी अनुदान उपलब्ध कराया गया था। यह मदरसा सरकारी भूमि पर बनाया गया है और इसके पंजीकरण तथा भवन के नक्शे/ब्लूप्रिंट स्थानीय प्रशासनिक निकायों के पास उपलब्ध न होने की पुष्टि हुई है।

रिपोर्ट के अनुसार सुनसरी क्षेत्र नंबर 4 की दो पालिकाओं - कोशी और भोक्राहा नरसिंह में ही 43 से अधिक मदरसे संचालित हैं। तीव्र इस्लामीकरण के कारण इस क्षेत्र को 'मिनी पाकिस्तान' तक कहा जाने लगा है और श्रीराम चौक का नाम बदलकर 'इस्लाम चौक' करने जैसी गतिविधियाँ देखी गई हैं। ऐसी गैर-कानूनी संरचनाएँ, अपारदर्शी विदेशी वित्तीय स्रोत, और विदेशी नागरिकों की अनियंत्रित उपस्थिति ने सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने गंभीर चुनौतियाँ खड़ी कर दी हैं।

मदरसा शिक्षा प्रणाली, मर्म और वर्गीकरण

मदरसा एक अरबी शब्द है, जिसका अर्थ विद्यालय होता है। दक्षिण एशियाई संदर्भ में, यह मुख्य रूप से कुरआन, हदीस, इस्लामी फ़िकह (न्यायशास्त्र) और धर्मशास्त्र पढ़ाने वाले धार्मिक शैक्षणिक संस्थान को संदर्भित करता है। कुछ मदरसों में आधुनिक विषय भी शामिल किए जाते हैं।

"दारुल उलूम" का शाब्दिक अर्थ "ज्ञान का घर" है, जो एक उच्च स्तरीय इस्लामी सेमिनरी को दर्शाता है, जबकि "अल-सुफ्फा" मदीना में पैगंबर की मस्जिद के पास अध्ययन करने वाले समर्पित सहाबाओं (साथियों) के समूह की ओर संकेत करता है। 19वीं सदी के भारत में दारुल उलूम देवबंद से शुरू हुआ देवबंदी आंदोलन हनफी फ़िकह पर आधारित एक सुन्नी पुनरुत्थानवादी परंपरा है, जो दक्षिण एशिया सहित विभिन्न देशों में फैली हुई है।

प्रशासनिक निगरानी, वित्तीय पारदर्शिता और दीर्घकालिक सुरक्षा चिंताएँ

यद्यपि धार्मिक विद्यालय शिक्षा के क्षेत्र में योगदान दे सकते हैं, फिर भी अनियंत्रित चंदा संग्रह, अपारदर्शी विदेशी निवेश और प्रशासनिक निगरानी के अभाव से कानूनी तथा सुरक्षा जोखिम उत्पन्न होते हैं। स्थानीय सरकार और प्रशासनिक निकायों के लिए संस्था का पंजीकरण, भूमि का स्वामित्व, वित्तीय लेखापरीक्षा (ऑडिट) और पाठ्यक्रम की नियमित निगरानी करना अनिवार्य है।

सरकार द्वारा औपचारिक नियमन से बाहर संचालित ऐसे गैर-कानूनी धार्मिक संस्थानों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करते हुए एक एकीकृत राष्ट्रीय शैक्षणिक मानक लागू करना, और साथ ही देवानगंज घटना की निष्पक्ष जाँच करके शांति-सुरक्षा तथा सांप्रदायिक सौहार्द को पुनर्स्थापित करना अत्यंत आवश्यक प्रतीत होता है।

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