चौतरफा विरोध और शैक्षणिक हलकों से तीखी आलोचना के बाद, आखिरकार फिल्म ‘मास्टर्नी’ के निर्माता और कलाकार अपनी गलती स्वीकार करते हुए पीछे हटने के लिए मजबूर हो गए हैं। फिल्म के तथाकथित प्रचारक गीत द्वारा शिक्षक पेशे, सामाजिक मर्यादा और शिक्षिकाओं के स्वाभिमान पर कीचड़ उछालने को लेकर देशव्यापी गुस्सा भड़कने के बाद, अभिनेत्री एवं निर्माता प्रियंका कार्की और गायक दुर्गेश थापा ने अलग-अलग स्पष्टीकरण जारी कर आम जनता से माफी मांगी है। विवादित गाने को दुर्गेश थापा के आधिकारिक यूट्यूब चैनल और उनके अन्य सभी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से हमेशा के लिए हटा दिया गया है।
दिलचस्प बात यह है कि चौतरफा घिरने के बाद अब निर्माण पक्ष यह दावा करने लगा है कि यह गीत फिल्म की मुख्य कहानी का हिस्सा ही नहीं था। अभिनेत्री प्रियंका कार्की ने अपने सोशल मीडिया पर एक लंबा संदेश लिखते हुए दावा किया है कि यह गीत फिल्म के भीतर शामिल कोई आधिकारिक गीत नहीं था, बल्कि विशुद्ध रूप से प्रचार के उद्देश्य से आपसी समन्वय से तैयार किया गया था। उन्होंने कहा कि कला और मनोरंजन परोसने के क्रम में समाज के सबसे सम्मानित पेशे और मार्गदर्शक व्यक्तित्वों पर नकारात्मक प्रभाव डालने का उनका कोई इरादा नहीं था। अनजाने में दर्शकों और नेपाल शिक्षक महासंघ की भावनाओं को ठेस पहुंचने पर गलती का अहसास करते हुए उन्होंने माफी मांगी है। इसी तरह, गायक दुर्गेश थापा ने भी दर्शकों और गुरुओं को भगवान का दर्जा देते हुए स्वीकार किया कि मनोरंजक शैली में प्रचार करने के बहाने भूलवश शिक्षकों की गरिमा को ठेस पहुंची, और उन्होंने इसके लिए दिल से माफी मांगी है।
गीत तो सोशल मीडिया से हट गया और निर्माताओं ने इसे एक ‘महत्वपूर्ण सबक’ के रूप में भी लिया, लेकिन यह माफी और आत्मसमर्पण पूर्ण नहीं लगता। फिल्म के शीर्षक ‘मास्टर्नी’ को लेकर इससे पहले उठाए गए गंभीर भाषाई, पितृसत्तात्मक और बौद्धिक सवालों पर दोनों ने बड़ी चालाकी से चुप्पी साध रखी है। नाम में छिपे कई अर्थों, भ्रामक इरादों और महिला शिक्षक या किसी की पत्नी को गलत तरीके से वर्गीकृत करने वाली पुरुषवादी सोच के बारे में निर्माण पक्ष ने अभी तक कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया है। क्या सिर्फ भद्दे और अश्लील शब्दों से भरे गाने को हटा देने से दर्शक फिल्म के नाम से जुड़ी सस्ती और भ्रामक मानसिकता से मुक्त हो जाएंगे? यह सवाल अभी भी अनुत्तरित है।
वास्तव में, सोशल मीडिया पर आम नागरिकों, अभिभावकों और बुद्धिजीवियों द्वारा किया गया यह तीव्र विरोध पूरी तरह से जायज और आवश्यक था। यह स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि सिनेमाघरों में रिलीज होने से पहले ही फिल्म के पूरी तरह से ‘फ्लॉप’ होने और निवेश के रेत में पानी की तरह डूबने के डर से ही निर्माताओं ने इस ‘डैमेज कंट्रोल’ यानी माफी का रास्ता चुना है। अगर दर्शकों ने इस तरह की जागरूकता नहीं दिखाई होती और चुप्पी साध ली होती, तो शायद कला के नाम पर समाज में अश्लीलता और विकृति परोसने का यह सिलसिला नहीं थमता। इस घटना से सबक लेते हुए आने वाले दिनों में फिल्म बनाने वाले निर्माताओं, पर्दे पर दिखने वाले कलाकारों और फिल्मों का निर्देशन करने वाले निर्देशकों को सामाजिक जिम्मेदारी और सृजन की मर्यादा के प्रति अधिक जिम्मेदार, मर्यादित और सचेत होने की आवश्यकता है। कला केवल एक व्यवसाय नहीं है, बल्कि समाज को दिशा दिखाने वाला एक आईना भी है, यह बात अब के निर्माताओं को समय रहते समझ लेनी चाहिए।