शैलेन्द्र भाटिया (भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी)
राप्ती नदी का बालू भरा किनारा व उसका फैलाव सुदूर तक सूखे बादल के ढेर मालूम पड़ रहे थे। जेठ की दुपहरी थी, मरीचिकाये कदमताल के साथ प्रकट होती और फिर कदमताल के साथ विलुप्त होती, यह क्रम बार-बार चल रहा था। रामगढ़ वैसा ही गांव था, जैसे नदी के किनारे के गांव होते है, बाढ़ के जख्म का चिन्ह जहाँ तहाँ दिखाई दे रहे थे। यह पूर्वी उत्तर प्रदेश का परंपरागत बाढ़ बाहुल्य गांव था। राम भरोसे एक किसान थे, रामगढ़ के। रामगढ़ को कस्बे से जोड़ने वाले बंधे के नीचे तल पर समानांतर पगडण्डी पर वे बढ़ते जा रहे थे। वे कभी नदी को देखते, जो एक पतली टेढ़ी मेढ़ी काली रेखा की तरह दिखाई दे रही थी, जिसे बालुओं ने संकरा कर रखा था, तो वे कभी अपने दाहिने खड़े बंधे को। यह पगडण्डी भी बाढ़ के साथ खत्म होती थी, फिर राम भरोसे जैसो के पदचाप से पुनर्जीवित हो जाती। यह क्रम भी वर्षो से चल रहा था। राम भरोसे चलते-चलते बंधे को देखते, फिर गहरी सांस लेते, फिर कुछ बुदबुदाते, फिर अचानक उनके कदम तेज हो जाते, यह अनवरत जारी था। जिस बांध को वे देख रहे थे, वह पंचवर्षीय योजना में परिकल्पना किये गए योजना के अनुरूप तो नही था, पर लोकतांत्रिक प्रयास का एक उदाहरण जरूर था। अगस्त महीने में अक्सर यह बांध दयालुता दिखाते हुए, राप्ती नदी की धारा को अपने में से रास्ता दे देता था, और पूरा का पूरा रामगढ़ बाढ़ से घिर कर मैरुण्ड हो जाता था। बाढ़ जैसा कि भारत मे आती है, पर शालीनता से चली भी जाती है, बाढ़ के रुक जाने के उदाहरण नही है। बाढ़ से भूमि उर्वरा होती है, नई मिट्टी आती है, डेल्टा का फैलाव बढ़ता है, सिंचाई विभाग के इंजीनियर का नैसर्गिक विकास होता है, टूटे बांध पर बोल्डर और बाड़ लगते है, सरकारी बजट का उपयोग पूर्ण होता है, अगले साल बांध के दूसरी जगह टूटने के आसार बढ़ जाते है। पर बाढ़ से राम भरोसे जैसो का नाम प्रभावित परिवारों के लिस्ट में लेखपाल दर्ज करता है। यह सिलसिला कई वर्षों से चल रहा है, या यूं कहें कि जब से बांध बना है। नदी, बांध व रामगढ़ इसी प्रकार एक दूसरे से सहयोग करते हुए वर्षों से आपस में मिलते आ रहे थे।
राम भरोसे के तेज कदम आखिरकार टूटे बांध पर इंजीनियरो के चहलकदमी से रुक गए। विचित्र विडम्बना है, सरकार हर साल बाढ़ राहत योजना बनाती है, पशुपालन विभाग से लेकर, राजस्व, सिंचाई, स्वास्थ्य, पी डब्ल्यू डी आदि को जिम्मेदारी और बजट दिया जाता है कि बाढ़ आयेगी ऐसी संभावना है, इससे पूर्व सभी बचाव की तैयारियां पूरी कर ली जाए, बजट का उपयोग कर लिया जाए। पर कभी कभी वित्तीय वर्ष के स्वर्णिम महीने मार्च में बजट आहरण से पता चलता है कि वाकई में बाढ़ के बचाव के प्रयास विभागों द्वारा किये गए थे। राम भरोसे चलते चलते टूटे बांध के पास जा पंहुंचे जहाँ उन्हें सिंचाई विभाग के इंजीनियर के आने का अंदाजा था। राम भरोसे ठिठककर इंजीनियर से बोले-"साहब आखिर बात क्या है? यह बांध न हुआ पपीते का पेड़ हो गया हैं? बिना बजह बार बार टूट जाता हैं? आप को पता है, पिछले साल की बाढ़ चार डेहरी अनाज लील गई, मेरा आधा मकान जो कच्चा था गिर गया, जो कुछ था सब बह गया। बड़ी मुश्किल से मैं और बुधनी बच पाए थे, जूनियर हाईस्कूल के कैम्प में चार दिन तक रहे थे, तब कही घर का पानी उतरा था। लेखपाल साहब सब लिख कर ले गए थे पर चेक अभी तक नही मिल पाया। एक दिन मिले, तो बोले मंत्रीजी के कार्यक्रम में एक दिन बंटेगा"
इंजीनियर साहब बोले-"राम भरोसे, बांध की मिट्टी में कमी है, नदी की धारा में कमी है, रामगढ़ की किस्मत में कमी है, इस कारण बांध टूटता है।"
राम भरोसे बीच मे टोकते हुए बोले-एक किसान की कोई किस्मत नही होती साहब। वो बार बार बर्बाद होता है। पर अपनी मिट्टी से कभी अलग नही हो पाता। ये मिट्टी उसे बार-बार खड़ा करती है। शरीर के पसीने और मिट्टी के मिलन से जो अनाज के दाने उगते है उन्ही से आप अपनी भूख मिटाते हैं वो इन्ही बिना किस्मत वालों के हांथो के कड़ी मेहनत के कारण हैं। हमे जो कर सकते है वो कर रहे है, पर आप?"
राम भरोसे कुछ क्षण रुकने के बाद फिर बोले-अब आप बताईये टूटे बांध की मरम्मत के लिये आप जेठ में आये है? पहले भी आ सकते थे? इंजीनियर साहब बोले-"सरकार बजट बनाती है, फिर बजट विधान मंडल में पास होता है। बजट अपने से नही आता, बजट लेने जाना पड़ता है, तब कही बजट धीरे-धीरे मुख्यालय से चलता है। बड़ी मुश्किल से पूरे जिले में बँटने के बाद रामगढ़ पंहुंचा है। तब हम जेठ में आ पाए हैं, बांध मरम्मत के लिए। बड़ी मेहनत करनी पड़ी है यहाँ आने तक।"
राम भरोसे बोले-"धेला भर का काम जमीन पर नही हुआ, आप कह रहे है, बड़ी मेहनत करनी पड़ी हैं।"
इंजीनियर साहब बोले-अब तुम ही बताओ, तुम्हें लेखपाल ने चेक अब तक नही दिये, क्यों?
राम भरोसे इसका मतलब बजट नही है? इंजीनियर साहब-"सही समझें।"
राम भरोसे "साहब आप नही जानते, ये सब वोट और चुनाव करवाता है। vote की बात नही होती तो, लेखपाल कब का चेक दे गया होता। अब आप मुझसे मुंह मत खुलवाईये। मुझे सब पता है। वोट के टाइम में ही विकास होता है, वोट के टाइम में ही राहत"
एक बात और आप से कहे-
"जनता से बड़ा कोई नही होता लोकतंत्र में, पर जनता ही सबसे छोटी हो जाती है।"
इस बार इंजीनियर चुप ही रहे। राम भरोसे जाते जाते बोले-"साहब इस बार बांध टूटा तो मैं टूट जाँऊगा। मैं बजट-वजट नही जानता। भगवान के लिए कुछ करिए।"
इंजीनियर साहब शब्दहीन बने रहे। एक किसान के कुछ हल्के शब्द बहुत भारी लग रहे थे। मौन रहते हुए अपना सिर हिलाये।
राम भरोसे ने इंजीनियर को देखा और बिना बोले हाथ जोड़कर कर नमस्कार किये और रामगढ़ के लिए चल दिये।
राम भरोसे अभी दस कदम ही चले थे। तभी पीछे से इंजीनियर साहब की भारी आवाज आयी "राम भरोसे इस बार मेरा विश्वास रखना, बांध नही टूटेगा।"
राम भरोसे मुड़े और धीरे से मुस्कराए और फिर हाथ जोड़ लिए।राम भरोसे की मुस्कराहट जैसे बुद्ध की मुस्कान हो। बिजली जैसा असर हुआ इंजीनियर साहब पर। इंजीनियर साहब जो केवल रश्मीतौर पर निरीक्षण कर रहे थे। अब वाकई में वे निरीक्षण करने लगे। बेलदार, मेढ और सुपरवाईजर को आवाज लगाने लगे। अब वाकई बांध के मरम्मत में जुड़ गए।
शब्द जो चुभ जाते है, वो परिणाम देते है। सकारात्मक लय होने पर ये प्रेरणा का कार्य करते हैं। नकारात्मक लय होने पर द्वंद्व कराते है। वाल्मीकि और महाभारत इसके उदाहरण है। इस साल अगस्त में बाढ़ आई पर बांध नही टूटा। राम भरोसे बांध पर धीरे-धीरे चल कर नदी, बांध और रामगढ़ को देख रहे थे। धीरे से बुदबुदाते हुए अपने से बात करते हुए बोले, "इन तीनों की किस्मत अब तक वाकई खराब थी। अब मुझे विश्वास है, अब खराब नहीं होंगी।"
सांन्झ हो चली थी, नदी खुशी से बांध पर हिलोरे मार रही थी, हल्की बूंदाबांदी के बीच राम भरोसे सिर पर अंगोछा रखकर रामगढ़ की ओर चल पड़े थे..... विश्वास लिए।