नेपाल में जनसंख्या वृद्धि दर में लगातार आ रही गिरावट को रोकने के उद्देश्य से सरकार ने संसद में प्रजनन को बढ़ावा देने वाला नया कानूनी विधेयक पेश किया है। स्वास्थ्य एवं खाद्य सुरक्षा मंत्रालय द्वारा प्रतिनिधि सभा में पेश किए गए सुरक्षित मातृत्व तथा प्रजनन स्वास्थ्य अधिकार संशोधन विधेयक में जनसंख्या वृद्धि दर को संभालने के लिए महिलाओं को छह महीने का सवैतनिक मातृत्व अवकाश और पुरुष कर्मचारियों को ४२ दिनों का पितृत्व देखभाल अवकाश देने का प्रावधान किया गया है।

यह कदम नेपाल में तेजी से कम होती जनसंख्या वृद्धि दर के आंकड़ों के बाद उठाया गया है। वर्ष २०६८ (2011) की जनगणना में १.३५ प्रतिशत रही नेपाल की जनसंख्या वृद्धि दर २०७८ (2021) में घटकर ०.९२ प्रतिशत पर आ गई, जो एक दशक में लगभग ३१ प्रतिशत की भारी गिरावट को दर्शाती है। त्रिभुवन विश्वविद्यालय के जनसंख्या अध्ययन केंद्रीय विभाग के सह-प्राध्यापक पद्म प्रसाद खतिवड़ा के अनुसार, दुनिया भर में १९७० के दशक में अपनाई गई जनसंख्या नियंत्रण नीतियों के कारण वृद्धि दर घटी थी। "यह हमें संकेत देता है कि जनसंख्या वृद्धि दर अब लगातार घटती जाएगी, क्योंकि अन्य देशों में भी जनसंख्या वृद्धि दर इसी तरह गिरती रही है। अब ऋणात्मक वृद्धि दर तक पहुंचने से रोकने के लिए जनसंख्या बढ़ाने की नीति आती दिख रही है," खतिवड़ा ने कहा।

संसद में विधेयक पर बोलते हुए मंत्री निशा मेहता ने स्पष्ट किया कि यह नीति राज्य के दीर्घकालिक मानव पूंजी निर्माण का आधार है। "छह महीने के मातृत्व अवकाश को हमें केवल कर्मचारियों को दी जाने वाली सुविधा या छुट्टी के रूप में नहीं देखना चाहिए। यह मातृत्व का सम्मान, मां और नवजात शिशु के स्वास्थ्य एवं पोषण तथा राज्य के दीर्घकालिक मानव पूंजी निर्माण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण विषय है," मंत्री मेहता ने कहा। उन्होंने यह भी कहा कि निजी स्वास्थ्य संस्थानों को अनुमति देते समय ही इन शर्तों का पालन अनिवार्य किया जाएगा।

प्रजनन प्रोत्साहन की इस व्यापक रणनीति के तहत मंत्रालय ने मां के दूध के पूरक विकल्पों की बिक्री और विपणन को नियंत्रित करने वाला विधेयक भी पेश किया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता डॉ समीर कुमार अधिकारी ने बताया कि यह कानून कामकाजी माताओं के अधिकारों और शिशु पोषण में सामंजस्य स्थापित करने के लिए लाया गया है। "हम छह महीने तक केवल मां का दूध पिलाने के लिए कहते हैं, लेकिन छह महीने की छुट्टी नहीं देते। हाल के दिनों में कामकाजी माताओं की बढ़ती संख्या और अन्य कारकों को ध्यान में रखते हुए इस असमानता को दूर करने के लिए यह संशोधन विधेयक लाया गया है," अधिकारी ने कहा। उन्होंने आगे कहा कि बाजार में मां के दूध से बेहतर बताने वाले उत्पादों का प्रचार-प्रसार तेजी से होने लगा था, जिसका दीर्घकाल में स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता देखा गया।

इसके अतिरिक्त, विधेयक में यह कठोर प्रावधान भी जोड़ा गया है कि आर्थिक तंगी या किसी अन्य कारण से कोई भी अस्पताल किसी गर्भवती महिला को प्रसूति सेवा देने से इनकार नहीं कर सकता। सप्तरी के राजविराज में आर्थिक अभाव के कारण अस्पताल द्वारा भर्ती न करने पर सड़क पर जन्म देने जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए दोषियों को छह महीने तक की जेल या ५०,००० रुपये जुर्माना अथवा दोनों सजाओं का प्रावधान किया गया है।

नेपाल में जनसंख्या नियंत्रण के दौर से निकलकर अब प्रजनन प्रोत्साहन की ओर बढ़ने का यह विधायी प्रयास देश के जनसांख्यिकी संतुलन और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक नया अध्याय साबित हो सकता है।