नेपाल के अति संवेदनशील हिमाली क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचा परियोजनाओं का निर्माण गंभीर पर्यावरणीय क्षति और दीर्घकालिक आर्थिक जोखिम पैदा कर रहा है।
गत २६ अगस्त २०२६ को रसुवा में आए भीषण हिम-चट्टान भूस्खलन और अचानक आई बाढ़ ने क्षेत्र की नाजुक स्थिति को उजागर कर दिया। इस आपदा में सैकड़ों लोगों की जान चली गई, गाँव तबाह हो गए और मुख्य राजमार्ग तथा पुल बह गए।
ऊर्जा संकट और बिजली का आपातकालीन आयात
इस आपदा में बारह जलविद्युत संयंत्र क्षतिग्रस्त हो गए। इसके कारण नेपाल की बिजली प्रणाली ठप हो गई और देश को अपना राष्ट्रीय ग्रिड सुचारु रखने के लिए भारत से लगभग ६५० मेगावाट बिजली का आपातकालीन आयात करना पड़ा।
पुनर्निर्माण की विशाल वित्तीय लागत
नेपाल के रैपिड डैमेज एंड नीड्स असेसमेंट (आरडीएनए) के अनुसार, क्षतिग्रस्त बुनियादी ढांचे के पुनर्निर्माण के लिए ७२३.३१ अरब नेपाली रुपये (लगभग ४.८ अरब अमेरिकी डॉलर) की आवश्यकता होगी।
विस्तारित बुनियादी ढांचा और भूगर्भीय खतरे
चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (बीआरआई) के तहत प्रस्तावित केरुंग-काठमांडू रेलवे, सड़क चौड़ीकरण और औद्योगिक क्षेत्रों का निर्माण कमजोर पहाड़ी ढलानों पर भारी दबाव डाल रहा है।
जलविद्युत परियोजनाओं पर मंडराता खतरा
पश्चिम सेती, तमोर और बूढ़ी गंडकी जैसी अत्यधिक संवेदनशील नदी घाटियों में निर्मित जलविद्युत परियोजनाएं निरंतर भूस्खलन और भूकंपीय खतरों के साए में हैं। सुरुंग निर्माण और जलाशय बनाने से ढलानें कमजोर हो रही हैं।
जोखिम भरा रेल नेटवर्क
प्रस्तावित केरुंग-काठमांडू रेल मार्ग बेहद खतरनाक क्षेत्र से होकर गुजरता है। यह मार्ग भूकंपीय रूप से संवेदनशील रसुवा-लांगतांग क्षेत्र और काठमांडू घाटी की कमजोर मिट्टी को प्रभावित करता है।
वित्तीय जोखिम और व्यापारिक मार्ग
चीनी बैंकों से उच्च ब्याज दरों पर प्राप्त ऋण से बनने वाली परियोजनाएं नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए वित्तीय संकट खड़ा कर सकती हैं। वर्ष २०१५ के गतिरोध के बाद भारत के कोलकाता बंदरगाह पर निर्भरता कम करने के लिए उत्तरी मार्गों को विकसित करने का प्रयास किया गया, लेकिन कठिन हिमाली संरचना के कारण यह बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।
हिमालय का संरक्षण नेपाल की राष्ट्रीय सुरक्षा और अस्तित्व से जुड़ा विषय है, इसलिए पर्यावरण की अनदेखी करके किया जाने वाला विकास विनाशकारी सिद्ध हो सकता है।