काठमांडू। भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच करने वाली संस्था 'अख्तियार दुरुपयोग अनुसंधान आयोग' (CIAA) द्वारा निजी क्षेत्र को भी अपनी जांच के दायरे में लाने की योजना ने नेपाल के व्यापारिक जगत में हलचल मचा दी है। निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों का कहना है कि यदि यह प्रस्ताव लागू हुआ, तो इससे न केवल निवेश का माहौल खराब होगा बल्कि कई उद्योग बंद होने की कगार पर पहुंच जाएंगे।
नेपाल चैंबर ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष कमलेश अग्रवाल ने इस कदम का कड़ा विरोध करते हुए कहा कि निजी क्षेत्र में अख्तियार का हस्तक्षेप कतई स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि निजी कंपनियां पहले से ही आंतरिक राजस्व विभाग, नेपाल राष्ट्र बैंक और कंपनी रजिस्ट्रार जैसे कई नियामक निकायों के अधीन हैं। ऐसे में एक और जांच एजेंसी का दबाव व्यापारियों को हतोत्साहित करेगा और उन्हें व्यवसाय विस्तार के बजाय सुरक्षा की चिंता करने पर मजबूर कर देगा।
व्यापारिक नेताओं का मानना है कि अख्तियार का मूल कार्य सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्तियों द्वारा सत्ता के दुरुपयोग की जांच करना है। अग्रवाल के अनुसार, निजी क्षेत्र जोखिम उठाकर स्वतंत्र रूप से निवेश करता है, इसलिए इस पर सरकारी नियंत्रण की तरह अंकुश लगाना अर्थव्यवस्था के लिए घातक होगा। उन्होंने चेतावनी दी है कि इस तरह के जबरन फैसलों से देश से पूंजी पलायन (Capital Flight) का जोखिम बढ़ जाएगा।
वहीं, नेपाल राष्ट्रीय व्यवसायी महासंघ के अध्यक्ष मनोजबाबू श्रेष्ठ ने सुझाव दिया है कि सरकार को निजी क्षेत्र पर निगरानी बढ़ाने के बजाय सीमा शुल्क प्रशासन (Customs) में सुधार और कर प्रणाली की जटिलताओं को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए। व्यापारियों का कहना है कि ऑडिट रिपोर्ट जमा करने के सालों बाद भी पुरानी फाइलें खोलकर व्यापारियों को परेशान करना बंद होना चाहिए।
वर्तमान दो-तिहाई बहुमत वाली सरकार के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह आर्थिक समृद्धि के लक्ष्यों और भ्रष्टाचार नियंत्रण के बीच संतुलन कैसे बनाती है। निजी क्षेत्र ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी सक्रियता के बिना देश का आर्थिक लक्ष्य प्राप्त करना संभव नहीं है। अब सबकी निगाहें सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं कि वह इस विवादित प्रस्ताव को आगे बढ़ाती है या निजी क्षेत्र की चिंताओं को प्राथमिकता देती है।