काठमांडू — पाकिस्तान फिर से गहराते राजनीतिक संकट के दौर में प्रवेश कर चुका है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की रिहाई की मांग करते हुए पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) द्वारा 27 सितंबर को देशव्यापी प्रदर्शन और इस्लामाबाद की ओर लॉन्ग मार्च की तैयारी करने के बाद पाकिस्तान की नागरिक राजनीति और सैन्य प्रतिष्ठान के बीच पुराना शक्ति संघर्ष पुनः सतह पर आ गया है।
पाकिस्तान का हालिया घटनाक्रम केवल एक राजनीतिक दल और सरकार के बीच विवाद तक सीमित नहीं है। इसने पाकिस्तान की राजनीतिक व्यवस्था में निर्वाचित संस्थानों के अधिकारों और सैन्य प्रतिष्ठान के प्रभाव के बीच मौजूद दीर्घकालिक असंतुलन को फिर से उजागर किया है।
नागरिक शासन पर सैन्य प्रभाव का सवाल
पाकिस्तान के राजनीतिक इतिहास में सेना का प्रभाव कोई नया विषय नहीं है। वर्ष 1958 से 1971, 1977 से 1988 और 1999 से 2008 तक प्रत्यक्ष सैन्य शासन का अनुभव कर चुके पाकिस्तान में सैन्य प्रतिष्ठान पर प्रत्यक्ष सत्ता से बाहर रहने के दौरान भी राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया को प्रभावित करने का आरोप लगातार लगता रहा है।
पिछले दशक में इस प्रभाव का स्वरूप बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। निर्वाचित सरकार और संसद कायम रहने के बावजूद राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति तथा महत्वपूर्ण राजनीतिक निर्णयों में सैन्य संस्था के प्रभाव पर सवाल उठ रहे हैं।
इसने पाकिस्तान के लोकतांत्रिक संस्थानों की स्थिरता और नागरिक सर्वोच्चता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
इमरान खान मामला और बढ़ता तनाव
इमरान खान की राजनीतिक यात्रा भी इस जटिल शक्ति संरचना से अलग नहीं है। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री बनने के दौरान उनके उभार को सैन्य प्रतिष्ठान के समर्थन से जोड़कर विपक्षी दलों और कुछ विश्लेषकों ने सवाल उठाए थे। हालांकि, खान और उनके दल ने ऐसे आरोपों को खारिज किया था।
लेकिन बाद में सैन्य नेतृत्व के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए और अप्रैल 2022 में उनकी सरकार सत्ता से बाहर हो गई। उसके बाद खान के खिलाफ विभिन्न मामलों में कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी और वह लंबे समय से जेल में हैं।
उनकी गिरफ्तारी और लगातार कारावास ने पाकिस्तान के राजनीतिक माहौल को और अधिक ध्रुवीकृत कर दिया है। PTI ने उनकी रिहाई को अपनी प्रमुख राजनीतिक मांग बनाया है।
27 सितंबर का प्रस्तावित मार्च इसी राजनीतिक टकराव के नए चरण के रूप में देखा जा रहा है।
27 सितंबर क्यों महत्वपूर्ण है?
PTI द्वारा इस्लामाबाद की ओर मार्च करने की घोषणा के बाद पाकिस्तान सरकार ने राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है। पंजाब सरकार ने रावलपिंडी, अटॉक, झेलम और मियांवाली में पाकिस्तान रेंजर्स तैनात करने का संघीय सरकार से अनुरोध किया है।
सरकार ने कहा है कि प्रदर्शन के दौरान सड़क अवरोध, हिंसा और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने के जोखिम को ध्यान में रखते हुए सुरक्षा तैयारियां बढ़ाई गई हैं।
दूसरी ओर, PTI ने अपने आंदोलन को इमरान खान की रिहाई और संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा करने वाले अभियान के रूप में प्रस्तुत किया है।
इस तरह 27 सितंबर पाकिस्तान के राजनीतिक शक्ति संतुलन का एक महत्वपूर्ण परीक्षण बन गया है।
सैन्य शक्ति और नया संस्थागत ढांचा
पाकिस्तान में हाल के दिनों में सैन्य नेतृत्व की संस्थागत भूमिका को लेकर बहस और तेज हो गई है। सेना प्रमुख असिम मुनीर को 2025 में फील्ड मार्शल का पद प्रदान किए जाने के बाद उनका संस्थागत प्रभाव और बढ़ गया है।
उसके बाद पाकिस्तान के सैन्य कमान ढांचे में किए गए संवैधानिक बदलावों ने भी सेना और राज्यसत्ता के बीच के संबंधों को नया स्वरूप दिया है।
इसने पाकिस्तान में एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा किया है—क्या निर्वाचित राजनीतिक संस्थान अंतिम निर्णयकर्ता हैं या सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव धीरे-धीरे संवैधानिक ढांचे के भीतर ही संस्थागत होता जा रहा है?
यही सवाल इस समय पाकिस्तान की राजनीतिक बहस के केंद्र में है।
भारत के लिए पाकिस्तान की राजनीतिक अस्थिरता का अर्थ
पाकिस्तान के आंतरिक राजनीतिक संकट का प्रभाव उसकी घरेलू सीमाओं से बाहर भी पड़ सकता है। विशेष रूप से भारत के लिए पाकिस्तान की राजनीतिक स्थिरता सीधे सुरक्षा चिंताओं से जुड़ी हुई है।
भारत-पाकिस्तान संबंध लंबे समय से सीमा विवाद, आतंकवाद, कश्मीर और सैन्य तनाव के कारण संवेदनशील रहे हैं। ऐसी स्थिति में पाकिस्तान के भीतर राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य प्रभाव का विस्तार दक्षिण एशियाई सुरक्षा माहौल में और अधिक अनिश्चितता पैदा कर सकता है।
भारत के लिए प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं—सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी सुरक्षा, राष्ट्रीय संप्रभुता का संरक्षण और एक स्थिर क्षेत्रीय माहौल।
इसलिए पाकिस्तान के आंतरिक शक्ति संघर्ष को भारत केवल इस्लामाबाद का घरेलू राजनीतिक विषय मानकर नहीं देख सकता।
पाकिस्तान की दोहरी चुनौती
पाकिस्तान एक ही समय में दो गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। पहला, देश के भीतर बढ़ता राजनीतिक ध्रुवीकरण और नागरिक-सैन्य शक्ति संघर्ष। दूसरा, TTP सहित सशस्त्र समूहों से उत्पन्न सुरक्षा चुनौती।
आतंकवाद पाकिस्तान के लिए एक वास्तविक सुरक्षा समस्या है। लेकिन आतंकवाद नियंत्रण के नाम पर राजनीतिक स्वतंत्रता, मीडिया और नागरिक अधिकारों पर दबाव बढ़ने से दीर्घकालिक संस्थागत स्थिरता और कमजोर होने का जोखिम रहता है।
यही विरोधाभास पाकिस्तान के वर्तमान संकट का महत्वपूर्ण पहलू है—राज्य द्वारा सुरक्षा बनाए रखने की आवश्यकता और लोकतांत्रिक संस्थानों को मजबूत करने की आवश्यकता के बीच संतुलन बनाए रखने की स्थिति।
अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का बदलता रुख
पाकिस्तान के आंतरिक राजनीतिक संकट के बीच उसके सैन्य नेतृत्व ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण पहुंच बनाए रखी है। विशेष रूप से अमेरिका के साथ पाकिस्तान के सुरक्षा संबंध हाल के समय में फिर से सक्रिय होते दिख रहे हैं।
इसने दक्षिण एशिया में एक जटिल कूटनीतिक वास्तविकता पैदा कर दी है। पाकिस्तान के भीतर सैन्य प्रभाव और राजनीतिक स्वतंत्रता पर सवाल उठने के बावजूद, बाहरी शक्तियां आतंकवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा और रणनीतिक हितों के कारण इस्लामाबाद के साथ सहयोग जारी रखने की इच्छुक दिख रही हैं।
भारत के लिए यह स्थिति और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि दक्षिण एशिया के शक्ति संतुलन में भारत की भूमिका बढ़ने के साथ पाकिस्तान से जुड़े सुरक्षा और कूटनीतिक समीकरण भी बदल रहे हैं।
दक्षिण एशिया के लिए बड़ा सवाल
पाकिस्तान के वर्तमान संकट का मूल सवाल अंततः इमरान खान या 27 सितंबर के प्रदर्शन से भी बड़ा है।
सवाल यह है—क्या पाकिस्तान अपने राजनीतिक भविष्य को निर्वाचित नागरिक संस्थानों की स्थिरता, संवैधानिक शासन और संस्थागत जवाबदेही पर आधारित बना सकता है या सैन्य प्रतिष्ठान का प्रभाव और गहरा होता जाएगा?
यदि नागरिक संस्थान कमजोर बने रहते हैं, तो पाकिस्तान में राजनीतिक अस्थिरता दोहराए जाने की संभावना बनी रहेगी। इसका प्रभाव पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था, सामाजिक स्थिरता और क्षेत्रीय कूटनीति पर भी पड़ सकता है।
भारत के लिए पाकिस्तान के राजनीतिक घटनाक्रम के साथ अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा पार स्थिरता को प्राथमिकता में रखना एक स्वाभाविक रणनीतिक आवश्यकता है।
27 सितंबर का आंदोलन पाकिस्तान की तात्कालिक राजनीतिक दिशा को कितना बदलता है, यह स्पष्ट होना बाकी है। लेकिन इसने एक बात साफ कर दी है—पाकिस्तान में नागरिक सत्ता और सैन्य शक्ति के बीच का संबंध अभी भी देश का राजनीतिक भविष्य तय करने वाले सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक बना हुआ है।