काठमांडू — यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में सूचीबद्ध पवित्र पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में संचालित गंगा आरती को लेकर नए तथ्य और गंभीर आरोप सामने आए हैं। सूत्रों का आरोप है कि धार्मिक अनुष्ठान के नाम पर संचालित इस आरती को पशुपति क्षेत्र विकास कोष को बिना कोई शुल्क दिए व्यापारिक मॉडल पर चलाया जा रहा है, संस्था के खाते में करोड़ों रुपये जमा किए गए हैं और इसमें कोष के अधिकारियों की भी मिलीभगत है।

रॉयल्टी शून्य, रिजर्व फंड में 10 करोड़ से अधिक

इससे पहले की बातचीत में गंगा आरती समिति के प्रतिनिधि नारायण पौडेल ने खुद स्वीकार किया था कि उन्होंने पशुपति क्षेत्र विकास कोष को किसी भी प्रकार का किराया, रॉयल्टी या शुल्क नहीं दिया है। सूत्रों का दावा है कि सार्वजनिक और धार्मिक संपत्ति का मुफ्त उपयोग करके संचालित इस आरती के नाम पर आम जनता और श्रद्धालुओं से भारी रकम वसूली गई है।

सूत्रों के अनुसार, पशुपति में केवल आरती संचालित करके संस्था ने करोड़ों रुपये एकत्र कर लिए हैं और वर्तमान में इस संस्था के रिजर्व फंड में 10 करोड़ रुपये से अधिक की राशि संचित है। नियमों के विपरीत और अपारदर्शी रूप से चल रही इस वित्तीय गतिविधि को बनाए रखने के लिए पशुपति क्षेत्र विकास कोष के भीतर कुछ भ्रष्ट अधिकारियों का प्रत्यक्ष संरक्षण और मिलीभगत होने का आरोप सूत्रों ने लगाया है।

धार्मिक और वास्तुशिल्प औचित्य पर सवाल

बागमती नदी के पार से संचालित हो रही गंगा आरती की दिशा और स्थान को लेकर भी गंभीर सवाल उठे हैं। पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर बागमती नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। धार्मिक और वास्तुशिल्प मान्यताओं के अनुसार आरती हमेशा भगवान के सम्मुख (पूर्व दिशा की ओर मुंह करके) की जानी चाहिए। हालांकि, वर्तमान गंगा आरती पश्चिम की ओर मुंह करके की जाती है, जिसे धार्मिक और शास्त्रीय मर्यादा के अनुकूल नहीं माना जा सकता।

इसके अलावा, जिस स्थान पर आरती की जा रही है उसके ठीक सामने आर्यघाट और भस्मेश्वर घाट स्थित हैं। एक तरफ चिता पर शव जलने का शोककुल वातावरण और दूसरी तरफ उसी को पृष्ठभूमि बनाकर गाजे-बाजे के साथ संगीतमय आरती का आयोजन करना हिंदू संस्कारों और दाह संस्कार की गंभीर मर्यादा के विपरीत है। जानकारों का कहना है कि शवदाह (मृत्यु का शोक) और आरती (उल्लास की पूजा) को एक ही स्थान पर मिलाकर व्यावसायिक रूप से प्रदर्शित करने से आर्यघाट की गंभीरता और पशुपति की मूल आध्यात्मिक चेतना ही विकृत हो गई है।

प्रबंधक सदस्य नारायण पौडेल से बातचीत

गंगा आरती के संचालन, आय और शुल्क निर्धारण के संबंध में संस्था के प्रबंधक सदस्य नारायण पौडेल के साथ हुई प्रत्यक्ष बातचीत का संपादित अंश:

प्रश्न: आपकी संस्था का नाम क्या है?

उत्तर: गंगा आरती समिति

प्रश्न: यदि किसी को अपने रिश्तेदार के नाम पर आरती करानी हो तो कितना पैसा देना होगा?

उत्तर:

  • प्रतिभागी: रु 1,500
  • 1 पारिवारिक: रु 5,100
  • 2 पारिवारिक: रु 10,100
  • 3 पारिवारिक: रु 15,100

प्रश्न: पशुपति के आर्यघाट पर आरती करके अब तक संस्था में कितना पैसा जमा किया गया है?

उत्तर: कार्यालय जाकर पता करें।

प्रश्न: संस्था में आपका पद क्या है?

उत्तर: प्रबंधक सदस्य

पौडेल का उल्टा सवाल: "बुढासुब्बा का कैमरा तोड़ने का सबूत कहां है?"

तस्वीर और बयानों के इस्तेमाल पर आपत्ति

प्रबंधक सदस्य नारायण पौडेल ने पहले प्रकाशित खबरों में अपनी तस्वीर और पुराने बयानों का बिना अनुमति इस्तेमाल किए जाने पर कड़ा असंतोष व्यक्त किया है। उनका दावा है कि उनके बयानों और तस्वीरों के अनधिकृत इस्तेमाल से उनका और संस्था का चरित्र हनन और मानहानि हुई है।

पवित्र भूमि पर पनपता व्यापारिक मॉडल

पशुपति की पवित्र भूमि पर संचालित गंगा आरती की कार्यप्रणाली, तय की गई महंगी शुल्क दरों और एकत्र की गई राशि की अपारदर्शिता से स्पष्ट है कि यह केवल धार्मिक सेवा न रहकर एक लाभ-केंद्रित व्यापारिक मॉडल के रूप में विकसित हो चुका है। मुफ्त सरकारी भूमि का उपयोग करके श्रद्धालुओं से भारी शुल्क वसूलने और नियामक निकाय कोष के अधिकारियों द्वारा मौन रहने की प्रवृत्ति यह साबित करती है कि पशुपति परिसर में वित्तीय अपारदर्शिता और बिचौलियों की नींव और मजबूत होती जा रही है।