काठमाडौँ। विश्व धरोहर सूची में सूचीबद्ध पवित्र पशुपतिनाथ मंदिर परिसर में दैनिक होने वाले संगीतमय एवं धार्मिक आरती संचालन, प्रशासनिक नियमन और समग्र सुरक्षा व्यवस्था को लेकर हाल के समय में गंभीर प्रश्न और चिंताएं उत्पन्न हुई हैं। पशुपति क्षेत्र विकास कोष द्वारा निर्धारित मासिक किराए और बैंक गारंटी सहित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुसार संचालित एक संस्था की सेवा को एकतरफा रूप से समाप्त कर दिए जाने, जबकि मंदिर परिसर में बिना किसी वित्तीय योगदान और निश्चित समय-सीमा के संचालित दूसरे समूह को निरंतरता दिए जाने को लेकर प्रशासनिक निष्पक्षता पर बहस शुरू हो गई है। दो अलग-अलग आरती संचालन के संदर्भ में कोष द्वारा अपनाए गए भिन्न-भिन्न मापदंडों ने मंदिर के वित्तीय नियमन, धार्मिक-सांस्कृतिक मर्यादा और सुरक्षा प्रबंधन में गंभीर दोहरे चरित्र को उजागर किया है।

नियमन और वित्तीय जवाबदेही के पहलू को देखें तो, संध्या आरती संचालन की जिम्मेदारी पाने वाली बुढासुब्बा डिजिटल प्रा.लि. ने कोष के साथ 5 वर्षों का आधिकारिक समझौता करके प्रति माह 1,60,000 रुपये (मूल्य संवर्धित कर रहित) राजस्व जमा करने, 6 महीने की अग्रिम धरोहर और बैंक गारंटी भी उपलब्ध कराकर निश्चित समय-सीमा के भीतर आरती का सीधा प्रसारण करती आ रही थी। लेकिन, कोष ने 2083 वैशाख 15 के निर्णय का हवाला देते हुए भदौ में उक्त समझौते को एकतरफा रूप से रद्द कर दिया। बुढासुब्बा के कार्यकारी प्रमुख नवराज गिरी के अनुसार साढ़े तीन करोड़ रुपये से अधिक का निवेश कर चुके होने और कोष द्वारा समझौते के अनुसार श्रद्धालुओं के लिए दीप प्रज्वलन की स्वीकृत दरें तक प्रदान न किए जाने के कारण आय न होने के समय समझौता रद्द किए जाने से वे कानूनी उपचार की तलाश में उच्च न्यायालय, पाटन पहुंचे हैं। दूसरी ओर, बागमती पार से आरती संचालित करने वाले गंगा आरती समूह के प्रतिनिधि नारायण पौडेल के अनुसार उनकी संस्था वि.सं. 2064 में जिला प्रशासन कार्यालय में पंजीकृत होकर तत्कालीन सदस्य-सचिव के कार्यकाल में कोष के लेटरहेड पर प्राप्त अनुमति पत्र के आधार पर संचालित है। पौडेल के अनुसार संस्था का नियमित नवीनीकरण होने के बावजूद कोष को कोई शुल्क नहीं देना पड़ा है और कोष ने मांगा भी नहीं है। नियमानुसार राजस्व चुकाने वाली संस्था को विस्थापित कर बिना किसी वित्तीय शर्त या समय-सीमा वाले समूह को निरंतरता देना प्रशासनिक नियमन में स्पष्ट भेदभाव दर्शाता है।

आरती के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक पहलू से भी गंभीर विषय जुड़े हुए हैं। भौगोलिक रूप से पशुपतिनाथ का मुख्य मंदिर बागमती नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। बुढासुब्बा द्वारा संचालित संध्या आरती पश्चिम से पूर्व दिशा (पूर्वाभिमुख) की ओर मुंह करके की जाती थी, जिसे धार्मिक और शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह दृष्टि को मंदिर और नदी की ओर केंद्रित रखती है। इसके विपरीत, गंगा आरती बागमती नदी के पार (पूर्वी तट) से पश्चिम की ओर मुंह करके संचालित होती आ रही है। इस प्रकार पश्चिम की ओर मुंह करके आरती करने से ठीक सामने आर्यघाट तथा भस्मेश्वर घाट पड़ते हैं, जहां नियमित रूप से शवदाह हो रहा होता है। आरती जैसा पवित्र अनुष्ठान शवदाह हो रही चिताओं की ओर मुंह करके करना और मंदिर की ओर पीठ फेरना धार्मिक मर्यादा के दृष्टिकोण से कितना उपयुक्त है, इस पर पशुपति क्षेत्र में समय-समय पर बहस होती रही है।

संचालन और प्रबंधन के अतिरिक्त मंदिर परिसर में अवांछित गतिविधियों और सुरक्षा चुनौतियों में भी वृद्धि हुई है। बुढासुब्बा डिजिटल पक्ष ने कार्यस्थल पर गंगा आरती समूह द्वारा बाधा पहुंचाए जाने के साथ-साथ अपने कैमरों को भी तोड़-फोड़ किए जाने का गंभीर आरोप लगाया है। इसके अलावा, समझौते की अवधि समाप्त होने के बाद भी 'भालेश्वर प्रा.लि.' के नाम पर मंदिर परिसर में अनाधिकृत फोटोग्राफरों और बिचौलियों की अवांछित मौजूदगी बनी हुई है तथा श्रद्धालुओं से जबरन पैसे वसूलने व अभद्र व्यवहार करने का सिलसिला थमा नहीं है। कुछ महीने पहले पशुपतिनाथ परिसर में भारतीय सेना के एक जवान पर स्थानीय लोगों द्वारा किए गए हमले की घटना ने मंदिर परिसर की समग्र सुरक्षा व्यवस्था और अवांछित तत्वों के नियंत्रण पर बड़ा सवाल खड़ा किया था।

इन समग्र विवादों, वित्तीय अपारदर्शिता और दोहरे मापदंडों के संबंध में पशुपति क्षेत्र विकास कोष के जिम्मेदार अधिकारियों से प्रतिक्रिया लेने पर प्रशासनिक चुप्पी और अनभिज्ञता प्रकट हुई है। कोष के सदस्य-सचिव तीर्थप्रसाद श्रेष्ठ ने बताया कि संध्या आरती (बुढासुब्बा) से संबंधित मामला अदालत में विचाराधीन होने के कारण कोष अदालत में ही जवाब देगा। गंगा आरती समूह के संदर्भ में श्रेष्ठ ने कहा कि यह उनके कार्यकाल से पहले का विषय होने के कारण उन्हें विस्तृत जानकारी नहीं है और जांच के बाद ही स्पष्ट होगा कि उन्होंने अनुमति ली है या नहीं, तथा उन्होंने सूचना अधिकारी से संपर्क करने का सुझाव दिया। हालांकि, वस्तुस्थिति के बारे में और अधिक स्पष्टता के लिए कोष के सूचना अधिकारी सूर्य रानाभाट से बार-बार टेलीफोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन वे उपलब्ध नहीं हुए। नियमों और प्रक्रियाओं के भीतर रहकर काम करने की कोशिश करने वाली संस्था का अदालत का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना और दूसरी ओर मंदिर परिसर में अवांछित गतिविधियों व अपारदर्शी संचालन का जारी रहना विश्व धरोहर की गरिमा को बचाने की कोष की प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।