नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह ने संयुक्त राष्ट्र संघ की 81वीं महासभा को संबोधित करते हुए हिमालयी क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न तबाही पर वैश्विक समुदाय को सचेत किया है। हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ से हुए भारी नुकसान का जिक्र करते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर जलवायु न्याय और साझा जिम्मेदारी की अपील की।
संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री शाह ने चार सप्ताह पूर्व भोटेकोशी-त्रिशूली क्षेत्र में आई बाढ़ को "हिमालयी सुनामी" बताते हुए कहा कि इस आपदा में कम से कम 1,400 लोगों की मृत्यु की पुष्टि हुई है तथा 6,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं। उन्होंने बताया कि इस तबाही से देश के सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 10 प्रतिशत के बराबर पुनर्निर्माण की आवश्यकता पैदा हो गई है।
उन्होंने कहा कि वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में नेपाल का योगदान 0.1 प्रतिशत से भी कम है, फिर भी देश को ग्लेशियर पिघलने और प्राकृतिक आपदाओं की भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। हिंदूकुश हिमालयी क्षेत्र के लगभग दो अरब लोगों की सुरक्षा के लिए उन्होंने नेपाल, भारत और चीन के नेतृत्व में एक "हिमालयन क्लाइमेट रेजिलेन्स मेकनिज़्म" स्थापित करने का प्रस्ताव रखा।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की वर्तमान स्थिति की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा कि दुनिया 72 घंटों के भीतर कहीं भी हथियार पहुंचाने में सक्षम है, लेकिन किसानों को समय पर खाद और ईंधन उपलब्ध कराने में विफल रहती है। उन्होंने कर्ज के बजाय अनुदान आधारित जलवायु वित्तपोषण की वकालत करते हुए राहत, पुनर्वास, पुनर्निर्माण, जिम्मेदारी, क्षतिपूर्ति और लचीलेपन को प्राथमिकता देने का आह्वान किया।
संबोधन के अंत में नेपाल ने बहुपक्षवाद के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराते हुए आगामी बैठकों के माध्यम से जलवायु अनुकूलन और निष्पक्ष वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के लिए अग्रणी भूमिका निभाने की बात कही।