नारायण मानन्धर


हिंदी में एक कहावत है, "समय समय की बात है।" इसका अर्थ है—खाने का एक समय होता है और दावत उड़ाने का दूसरा। आपके संस्कारों और रीति-रिवाजों को निभाने के भी अलग-अलग समय होते हैं। आइए, खाने और खिलाने के इस समय चक्र को गौर से देखें।

खिलाने का पदानुक्रम (Hierarchy)

पाठकों ने नेशनल जियोग्राफिक या हिस्ट्री चैनल पर जानवरों के शिकार के कार्यक्रम जरूर देखे होंगे। जरा याद कीजिए: अक्सर एक शेर बड़ा शिकार करता है, मान लीजिए एक भैंसा या जिराफ गिरा दिया जाता है। शिकार करने की प्रक्रिया से ज्यादा दिलचस्प उसके बाद का नजारा होता है। अक्सर 'जंगल का राजा' ही पहला निवाला लेता है। वह शरीर के पिछले हिस्से से खाना शुरू करता है, क्योंकि वहीं सबसे बेहतरीन मांस होता है, जिसे हम नेवारी में 'ह्याकुला' कहते हैं। इसके बाद दूसरे, शायद छोटे शावकों के साथ, उस छीना-झपटी में शामिल हो जाते हैं।

जैसे-जैसे खाने का उन्माद बढ़ता है, आप देखते हैं कि एक-दो बहादुर लकड़बग्घे (Hyenas) यहाँ-वहाँ से हाथ साफ करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें भूखे और उतने ही गुस्सैल शेर भगा देते हैं। धीरे-धीरे, लकड़बग्घों की संख्या शेरों से ज्यादा हो जाती है और वे शेरों को घेरे से बाहर धकेलने में सफल हो जाते हैं। कहा जाता है कि लकड़बग्घों के दांत बहुत मजबूत होते हैं। वे हड्डियाँ चबा सकते हैं और मज्जा (marrow) खा सकते हैं जो शेरों के लिए मुश्किल होता है। वे कुछ भी खा सकते हैं।

कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब लकड़बग्घे दावत में व्यस्त होते हैं, तो गिद्ध धीरे-धीरे मंडराने लगते हैं। ताकतवर लकड़बग्घे उन्हें पीछे धकेलने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे उन बदसूरत दिखने वाले जीवों से लड़ने की हिम्मत कम ही करते हैं। धीरे-धीरे गिद्धों की संख्या भी लकड़बग्घों से अधिक हो जाती है और वे उन्हें पीछे हटने पर मजबूर कर देते हैं। पेट भर जाने पर लकड़बग्घे पीछे हटना ही बेहतर समझते हैं। गिद्ध विशेष प्राणी हैं, जिनकी चोंच और पंजे इतने मजबूत होते हैं कि वे मांस के उन टुकड़ों को भी निकाल लेते हैं जो शेर और लकड़बग्घों की पहुँच से बाहर थे। नेपाली में हम उन्हें 'धार्मिक चरा' (धार्मिक पक्षी) कहते हैं। वे जीवित प्राणियों को नुकसान नहीं पहुँचाते; वे मृत शरीरों को खाकर खुश रहते हैं।

जरा रुकिए। कहानी अभी अधूरी है। जब तक गिद्धों के खाने की बारी आती है, तब तक शव सड़ चुका होता है और उसमें कीड़े (maggots) पड़ जाते हैं। किस्मत वाले हैं आप कि इसे टीवी पर देख रहे हैं, वरना उसकी दुर्गंध आपको इस नाटक का आनंद नहीं लेने देती। अब बारी आती है उन नन्हे चुलबुले पक्षियों की, जो अंदर-बाहर फुदकते हुए खुशी-खुशी उन कीड़ों को चुगते हैं; नाचते, गाते और खेलते हुए।

अब आपके लिए एक कठिन काम है: इस कहानी को अपने देश के भ्रष्टाचार की स्थिति से जोड़कर देखिए। क्या राणाओं, शाहों और पंचों ने 'ह्याकुला' में अपना हिस्सा नहीं लिया? क्या बहुदलवादियों ने लकड़बग्घों की भूमिका नहीं निभाई? माओवादियों या जिन्हें अब 'खाओवादी' कहा जाने लगा है, उनके बारे में क्या ख्याल है? क्या आपने उनकी भूख नहीं देखी? वैसे, एक टैक्सी ड्राइवर ने मुझे कुछ साल पहले बताया था कि काठमांडू में 'मोमोज' की लोकप्रियता माओवादियों के आने के साथ बढ़ी। 'जेन-जी' (Gen-Z) के नन्हे पक्षियों के बारे में क्या? क्या वे यहाँ कीड़ों को खाने आए हैं? क्या आप जन-आंदोलनों को लकड़बग्घों और गिद्धों की तरह नहीं देखते जो केवल अपनी संख्या के बल पर विरोधियों को बाहर धकेलते हैं? 'भागबंडा' (बंटवारा) और 'आलो-पालो' (बारी-बारी से खाना, म्यूजिकल चेयर का खेल) की व्यवस्था इसी खाने-खिलाने के सामाजिक पदानुक्रम का हिस्सा है। क्या आप कभी पारंपरिक नेवारी भोज में गए हैं? सबसे बुजुर्ग या 'थकुली' पंक्ति में सबसे ऊपर बैठता है, उसके बाद उम्र के अनुसार कनिष्ठ बैठते हैं। बच्चों और महिलाओं की बारी अंत में आती है। यहाँ खाने का भी एक पदानुक्रम है।

भ्रष्टाचार मुक्त समाज जैसा कुछ नहीं होता

भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' या 'भ्रष्टाचार मुक्त समाज' एक शुद्ध धोखा है, जो लोगों को नहीं बल्कि 'भेड़ों' (sheepals) को गुमराह करने के लिए बनाया गया एक राजनीतिक दुष्प्रचार है। यदि आपको विश्वास नहीं है, तो किसी डेन या फिन (Danes or Finns) से पूछें—क्या वे भ्रष्टाचार से मुक्त हैं? क्या वे भ्रष्टाचार सूचकांक (CPI) में शीर्ष पर नहीं हैं? गरीबी की तरह भ्रष्टाचार को भी केवल कम किया जा सकता है, इसे कभी खत्म नहीं किया जा सकता। यदि आप भ्रष्टाचार को जड़ से खत्म करने की सोच रहे हैं, तो शायद आप ख्याली दुनिया में जी रहे हैं।

RSP और RSVP

आपमें से कितने लोगों को डिनर का निमंत्रण पत्र मिला है जिसमें फ्रांसीसी संक्षिप्त नाम 'RSVP' लिखा हो? 'RSP' में 'V' गायब है। हाँ, यह RSP के लंच का समय है। इसीलिए वे राजनीतिक नियुक्तियों वाले लोगों से शिष्टतापूर्वक अपनी जगह खाली करने को कह रहे हैं। क्योंकि अब उनके खाने की बारी है। जल्द ही हम लोगों को दावत उड़ाते देखेंगे—मलाईदार ठेके लेना, रसूख वाली नौकरियां, राजनयिक नियुक्तियां, सलाहकार और परामर्शदाता बनना। युवराज खतिवडा या शंकर शर्मा जैसे लोगों को इस बदली हुई स्थिति में तालमेल बिठाने में मुश्किल हो सकती है। याद रखें कि 'NEPAL' का 'NEP', 'Nepotism' (भाई-भतीजावाद) का प्रतीक है। निश्चित रूप से, अपने करीबियों को नौकरी पर रखना कोई अपराध नहीं है। यहाँ की मेरिट प्रणाली या 'जानने वाले को चुनना' (janne lai chhane) अंततः 'पैसे वाले को मानना' (paisa bhayeko lai manne) में बदल सकता है। यह खाने और दावत उड़ाने का नजारा देखने का समय है। और यह भी याद रखें: उम्र जितनी कम, भ्रष्टाचार उतना ही अधिक। ऐसा इसलिए है क्योंकि युवा भ्रष्टाचार के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं। उनमें कतार में खड़े होने का धैर्य नहीं होता। क्या आपमें है?

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