काठमाडौँ — प्राकृतिक आपदा के समय नागरिकों को धैर्य, सटीक जानकारी और आधिकारिक निकायों के समन्वय की आवश्यकता होती है। लेकिन सोशल मीडिया पर चर्चा और प्रचार बटोरने के लिए दहशत (पैनिक) पैदा करने और भ्रामक जानकारी फैलाने की प्रवृत्ति दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। कार्यकर्ता वेदिका केसी इसका ताज़ा उदाहरण बन गई हैं।

आपदा प्रबंधन के तकनीकी पहलुओं और सड़कों की वास्तविक स्थिति के बारे में बिना किसी अध्ययन या तैयारी के केवल सनक के आधार पर निकल पड़ना, और रास्ते में समस्या आने पर सोशल मीडिया पर ड्रामा और सहानुभूति बटोरने का खेल एक बार फिर दोहराया गया है।

वेदिका केसी ने कल सोशल मीडिया पर एक लंबा स्पष्टीकरण लिखते हुए रसुवा न पहुँच पाने पर अपनी लाचारी व्यक्त की है।

उन्होंने अपने स्टेटस में लिखा है— "हमने रसुवा जाने का हर संभव प्रयास किया। निजी हेलीकॉप्टर बुक करना संभव नहीं था, और गाड़ी से ढुंगे का रास्ता खराब था। जिला प्रशासन के साथ समन्वय करके नौकुंडा के रास्ते जाने की कोशिश की तो सूर्यगढ़ी में ही बड़ा भूस्खलन हो गया—मैंने सुबह ही सबूत के साथ तस्वीरें पोस्ट कर दी हैं। बाइक तक जाने की स्थिति नहीं थी।"

अपने बचाव में स्टेटस के अंत में उन्होंने आगे लिखा— "इतना सब करने के बाद भी न जा पाना मेरी खुशी नहीं है। मैं उड़कर तो नहीं जा सकती न! हर संभव प्रयास करने पर भी रास्ते ने साथ नहीं दिया। अब जहाँ संभव होगा, वहाँ के पीड़ितों तक पहुँचने का प्रयास जारी रहेगा।"

रास्ता खराब होने, भूस्खलन होने और बाइक भी न चल पाने की स्थिति का सोशल मीडिया पर इस तरह अतिरंजित वर्णन करते समय इस बात का जरा भी ध्यान नहीं रखा गया कि इससे उस क्षेत्र के पीड़ितों के रिश्तेदारों और आम लोगों में कितना भय, भ्रम और दहशत पैदा होती है।

सुरक्षा बलों और स्थानीय प्रशासन द्वारा सड़कों की स्थिति को नियंत्रण में लिए जाने के दौरान, निजी प्रयासों से 'उड़ न पाने' की बात कहकर सोशल मीडिया पर भ्रम फैलाना और हंगामा खड़ा करना गैर-जिम्मेदारी की पराकाष्ठा है।

जिला प्रशासन और आपदा प्रबंधन समिति की पूर्व सूचना और आधिकारिक सलाह का पालन करने के बजाय, निजी हेलीकॉप्टर की तलाश करना और रास्ता बंद होने की दहशत फैलाना आधिकारिक बचाव तंत्र को भी प्रभावित करता है।

सहानुभूति और 'लाइक-कमेंट' बटोरने के लिए आपदा को मीडिया स्टंट बनाने और "मैं उड़कर तो नहीं जा सकती न!" जैसी हल्की बातें कहकर पल्ला झाड़ने की प्रवृत्ति ने वास्तविक राहत कार्य में मदद करने के बजाय भ्रामक जानकारी को बढ़ावा दिया है।

स्थानीय प्रशासन की पूर्व सूचना और रास्ते की स्थिति को समझे बिना राहत वाहन लेकर निकल पड़ना, और बीच रास्ते में रुकने के बाद 'सबूत के साथ तस्वीरें' पोस्ट करके सोशल मीडिया पर रोना-धोना करने की यह अपरिपक्व शैली आम लोगों के बीच केवल अनर्गल अफवाहें और दहशत फैलाती है।

अरे वाह! राज्य के सुरक्षा बल, बचाव दल और स्थानीय प्रशासन तो आपदा में यूँ ही चुपचाप बैठे होंगे, लेकिन हमारे सोशल मीडिया के 'हीरो' केवल उड़ने वाले पंख न होने के कारण रसुवा नहीं पहुँच पाए! रास्ते में भूस्खलन होने और बाइक भी न चल पाने की 'सबूत वाली तस्वीरें' सोशल मीडिया पर पोस्ट करके आम लोगों में दहशत फैला देना ही राहत पहुँचाने के बराबर हो गया! जब तक नेपाल में उड़ने वाली तकनीक नहीं आ जाती, तब तक ऐसे सोशल मीडिया नायक फेसबुक से ही दहशत पैदा करके आपदा प्रबंधन कर देंगे, इसलिए अब सरकार भी बेफिक्र होकर बैठ सकती है!

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