एक आधुनिक उत्तराधिकारी का वादा
२७ जून, १९७१ को नारायणहिटी राजमहल की भव्य दीवारों के भीतर जन्मे दीपेंद्र बीर बिक्रम शाह देव को एक प्राचीन राजवंश के आधुनिक चेहरे के रूप में तैयार किया गया था। राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या के सबसे बड़े बेटे के रूप में, उनका प्रारंभिक जीवन कठोर परंपरा और प्रगतिशील शिक्षा के मिश्रण से चिह्नित था। अपने पूर्वजों के विपरीत, दीपेंद्र ने काठमांडू के बूढानीलकंठ स्कूल में शिक्षा प्राप्त की, एक ऐसा निर्णय जिसने उन्हें जनता के बीच एक "स्वदेशी राजकुमार" के रूप में प्रिय बना दिया। उनकी शैक्षणिक और एथलेटिक प्रतिभा ने इस छवि को और मजबूत किया; उन्होंने त्रिभुवन विश्वविद्यालय में भूगोल में अपनी मास्टर डिग्री में शीर्ष स्थान प्राप्त किया, कराटे में ब्लैक बेल्ट हासिल की और एक पायलट के रूप में प्रशिक्षण लिया। हालाँकि, यूनाइटेड किंगडम के ईटन कॉलेज में उनके समय ने उन्हें पश्चिमी उदारवाद से परिचित कराया, जिससे एक ऐसी जीवनशैली के बीज पड़े जो अंततः नेपाली दरबार की कठोर अपेक्षाओं से टकराने वाली थी।
महल की दीवारों के पीछे का 'बैड बॉय'
जहाँ सार्वजनिक रूप से उन्हें एक करिश्माई और मिलनसार "जनता के राजकुमार" के रूप में सराहा जाता था, वहीं दीपेंद्र नागरिकों से छिपी एक अस्थिर दोहरी जिंदगी जी रहे थे। आधिकारिक जाँच और महल के सहयोगियों की गवाही से एक ऐसे व्यक्ति का खुलासा हुआ जो नशीले पदार्थों की लत से जूझ रहा था, अक्सर शराब का सेवन करता था और चरस मिली सिगरेट पीता था। अपनी पार्टी करने की आदतों के अलावा, उन्हें आग्नेयास्त्रों (firearms) का भी जुनून था। उन्होंने आधुनिक स्वचालित हथियारों का एक निजी जखीरा जमा कर लिया था, जिसमें MP5 सबमशीन गन और M16 राइफलें शामिल थीं, जिन्हें वे अक्सर अपने निजी क्वार्टर के भीतर भी अपने साथ रखते थे। भारी नशा और हथियारों तक पहुँच का यह खतरनाक मिश्रण उनके स्वभाव से और भी जटिल हो गया था, जिसे कर्मचारियों ने 'मुडी' और अपनी इच्छा पूरी न होने पर हिंसक गुस्से वाला बताया था।
प्यार बनाम वंश
दीपेंद्र के जीवन का केंद्रीय संघर्ष देवयानी राणा के साथ उनके गहन, दीर्घकालिक संबंधों के इर्द-गिर्द घूमता था, जो पशुपति शमशेर जे.बी. राणा और उषा राजे सिंधिया की बेटी थीं। देवयानी की कुलीन पृष्ठभूमि के बावजूद, रानी ऐश्वर्या ने जटिल वंश संबंधी विवादों और सिंधिया परिवार की अपार संपत्ति के कारण इस रिश्ते का कड़ा विरोध किया, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसने शाह परिवार के साथ अहंकार का टकराव पैदा कर दिया था। स्थिति तब टूटने की कगार पर पहुँच गई जब राजा बीरेंद्र और रानी ऐश्वर्या ने एक सख्त अल्टीमेटम जारी किया: दीपेंद्र या तो देवयानी से शादी करें और अपने छोटे भाई, राजकुमार निराजन के पक्ष में सिंहासन का दावा छोड़ दें, या परिवार की पसंद, सुप्रिया शाह से शादी करें और उत्तराधिकारी बने रहें। १ जून, २००१ की रात को, फोन रिकॉर्ड ने पुष्टि की कि दीपेंद्र ने देवयानी से कई बार बात की थी, और उनकी आवाज इतनी लड़खड़ा रही थी कि देवयानी ने उनकी अस्थिरता को भांपते हुए उनके सहयोगियों को उन्हें देखने के लिए फोन किया।
ब्लैक फ्राइडे का नरसंहार
तनाव १ जून, २००१ की शाम को त्रिभुवन सदन में एक पारंपरिक पारिवारिक रात्रिभोज के दौरान हिंसा के भयानक विस्फोट में बदल गया। भारी नशे में धुत और सेना की कॉम्बैट ड्रेस पहने हुए, दीपेंद्र MP5 सबमशीन गन और M16 राइफल से लैस थे। एक ऐसे हत्याकांड में जिसने नेपाल के इतिहास की दिशा बदल दी, उन्होंने सबसे पहले अपने पिता, राजा बीरेंद्र को गोली मारी। इसके बाद उन्होंने व्यवस्थित रूप से अन्य शाही सदस्यों को निशाना बनाया, जिसमें उनके भाई राजकुमार निराजन, उनकी बहन राजकुमारी श्रुति, उनके चाचा और उनकी चाची शामिल थे। इस कत्लेआम का अंत महल के बगीचे में हुआ, जहाँ उन्होंने अपनी माँ, रानी ऐश्वर्या का सामना किया और खुद पर बंदूक तानने से पहले उनकी गोली मारकर हत्या कर दी।
कोमा में राजा और संदेह की विरासत
दीपेंद्र महल के बगीचे में एक पुल के पास सिर में गोली के घाव के साथ पाए गए। संवैधानिक आवश्यकता के एक विचित्र मोड़ में, बेहोश राजकुमार को २ जून, २००१ को बीरेंद्र सैनिक अस्पताल में लाइफ सपोर्ट पर रहते हुए नेपाल का राजा घोषित किया गया। ४ जून, २००१ को मृत घोषित किए जाने से पहले उन्होंने कोमा में तीन दिनों तक शासन किया। उनकी मौत ने काठमांडू में दंगों और कर्फ्यू को हवा दी, जिसे "लेफ्ट-हैंडेड थ्योरी" (बाएँ हाथ के सिद्धांत) ने और भड़काया—यह एक लगातार चलने वाली साजिश थी जो इस फोरेंसिक तथ्य से पैदा हुई थी कि दाहिने हाथ के राजकुमार के बाएँ कनपटी पर गोली का घाव था। जहाँ आधिकारिक रिपोर्टों ने निष्कर्ष निकाला कि यह आत्महत्या थी, वहीं संदेह ने राजशाही के नैतिक अधिकार को चकनाचूर कर दिया। उनके चाचा, राजा ज्ञानेंद्र का बाद का शासन जनता का विश्वास बहाल करने में विफल रहा, जिसके कारण २००८ में २४० साल पुराने शाह वंश का उन्मूलन हो गया। आज, दीपेंद्र को एक ऐसे दुखद व्यक्ति के रूप में याद किया जाता है जिसने उस संस्था को ही नष्ट कर दिया जिसे बचाने के लिए उनका जन्म हुआ था।