वीरगंज — वीरगंज के प्रतिष्ठित सार्वजनिक संस्थान हरी खेतान बहुमुखी कैंपस के संविधान में प्रबंधन समिति के अध्यक्ष प्रेम प्रकाश खेतान द्वारा अवैध और अनैतिक रूप से बदलाव कर कैंपस की अरबों रुपये की बहुमूल्य संपत्ति और जमीन पर कब्जा करने की गहरी साजिश का पर्दाफाश हुआ है। हितधारकों ने यह सनसनीखेज तथ्य सामने लाया है कि संविधान में हेरफेर और संशोधन का यह पूरा खेल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा और व्यावसायिक लाभ के लिए, समुदाय द्वारा स्थापित इस ऐतिहासिक कैंपस को एक निजी जागीर की तरह चलाने की नीयत से खेला गया था।

'दाता' की आड़ में पारिवारिक विरासत का खेल

कैंपस के वर्तमान संविधान में 'दाता' (Donor) की परिभाषा को अत्यंत संकीर्ण और पूरी तरह से पारिवारिक स्वार्थ के अनुकूल बना दिया गया है। संविधान के परिच्छेद-१ के बुँदा २ (ग) में स्पष्ट रूप से लिखा है:

"दाता" से तात्पर्य स्वर्गीय बिहारी लाल खेतान के परिवार द्वारा स्वर्गीय हरी खेतान की स्मृति में कैंपस संचालित करने के उद्देश्य से कैंपस की भौतिक संरचना निर्माण के लिए जमीन खरीद की व्यवस्था कर उस जमीन पर कैंपस के लिए भौतिक संरचना तैयार कर कैंपस को हस्तान्तरित करने वाले खेतान परिवार के स्वर्गीय हरी खेतान के बेटे प्रेम प्रकाश खेतान और उनके वारिसों में से उनके द्वारा भरोसेमंद व्यक्ति से है।

हितधारकों और संरक्षणवादियों का आक्रोश: यह कैंपस पूरी तरह से एक सामुदायिक और सार्वजनिक संपत्ति है। कानूनविदों और स्थानीय समाज के अनुसार, किसी भी परिस्थिति में इस सार्वजनिक संस्थान का मालिकाना हक या सर्वोच्च नियंत्रण स्वर्गीय हरी खेतान के बेटे प्रेम प्रकाश खेतान या उनके निजी वारिसों को हस्तान्तरित नहीं किया जा सकता है।

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, कैंपस निर्माण के शुरुआती दौर में खेतान परिवार ने केवल पत्थर, बालू, ईंट और सीमेंट जैसी बुनियादी सामग्रियों (जिन्सी) का सहयोग दिया था। उसी सामग्री दान के बदले उस समय उनके दिवंगत बेटे के नाम पर कैंपस का नामकरण मात्र किया गया था। हरी खेतान के पिता ने कुछ निर्माण सामग्री दान में दी थी, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आज आकर पूरे सार्वजनिक संस्थान पर पारिवारिक मिल्कियत का दावा ठोक दिया जाए। यह कदम पूरी तरह से अनैतिक और अवैध है।

सार्वजनिक संपत्ति को 'निजी व्यक्ति की तरह' बेचकर खाने की चाल?

कैंपस के वर्तमान संविधान में शामिल एक और सबसे विवादास्पद और खतरनाक प्रावधान चल-अचल संपत्ति की खरीद-बिक्री और उसके विमुद्रीकरण (Liquidation) से संबंधित है। संविधान में लिखा है:

"कैंपस इस संविधान के अधीन रहकर एक व्यक्ति की तरह चल-अचल संपत्ति प्राप्त कर सकता है, रख सकता है, बेच सकता है या अन्य तरीकों से प्रबंधित कर सकता है।"

एक सार्वजनिक सामुदायिक संस्थान के संविधान में 'व्यक्ति की तरह संपत्ति बेचने' का अधिकार सुरक्षित करना ही प्रेम प्रकाश खेतान की नीयत पर गंभीर सवाल खड़े करता है। स्थानीय संरक्षणवादी आक्रोशित होकर सवाल कर रहे हैं— "क्या प्रेम प्रकाश खेतान इस अरबों की सार्वजनिक संपत्ति और बेशकीमती जमीन को अपनी सुविधा के अनुसार औने-पौने दामों में बेचकर खुद हजम करना चाहते हैं?"

इसी कारण, इस खतरनाक प्रावधान को तुरंत खारिज कर उसके स्थान पर सार्वजनिक हित की रक्षा करने वाली निम्नलिखित व्यवस्था रखने की जोरदार मांग की गई है:

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"कैंपस इस संविधान के अधीन रहकर चल-अचल संपत्ति प्राप्त कर सकता है और केवल उसका संस्थागत प्रबंधन कर सकता है।"

इसके साथ ही, वर्तमान संविधान में कैंपस सभा के सदस्यों की परिभाषा में दाता और उसके द्वारा मनोनीत चमचों को ही सर्वेसर्वा बनाने वाले नियम को भी सार्वजनिक संपत्ति के मूल सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए पूरी तरह हटाने की मांग उठी है।

काठमांडू में बैठकर वीरगंज पर 'हुकूम' चलाने की साजिश

प्रबंधन समिति द्वारा कैंपस का मुख्य संपर्क कार्यालय राजधानी काठमांडू में स्थापित करने की व्यवस्था भी इस समय भारी विवादों के घेरे में है। संविधान के परिच्छेद-१ के बुँदा ४ (घ) में कहा गया है:

"आवश्यकता के अनुसार कैंपस का संपर्क कार्यालय काठमांडू में रह सकता है।"

स्थानीय नागरिकों का आरोप: अध्यक्ष प्रेम प्रकाश खेतान खुद स्थायी रूप से काठमांडू में ऐश ओ आराम से रहते हैं। वीरगंज में मौजूद असली हितधारकों—छात्रों, कर्मचारियों, प्रोफेसरों और स्थानीय समुदाय के साथ उनका कोई संपर्क या सीधा संवाद नहीं होता है। वह केवल कुछ सीमित व्यावसायिक स्वार्थ समूहों (Corporate Interest Groups) के इशारों पर काम करते हैं। नागरिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राजधानी के एक वातानुकूलित कमरे में बैठकर वीरगंज के इस ऐतिहासिक संस्थान पर प्रशासनिक और वित्तीय तानाशाही चलाने के लिए ही यह चोर-दरवाजा रखा गया था। इसलिए प्रस्तावित नए संशोधन में इस संपर्क कार्यालय की व्यवस्था को जड़ से खत्म करने की मांग की गई है।

प्रस्तावित संशोधन: सार्वजनिक हित या व्यक्तिगत कब्जे का अंत?

हाल ही में कैंपस के भीतर और बाहर बढ़ते भारी जनाक्रोश और दबाव के बाद संविधान में आमूलचूल बदलाव के लिए एक 'प्रस्तावित संशोधन' का मसौदा तैयार किया गया है। यह संशोधन प्रेम प्रकाश खेतान के व्यक्तिगत एकाधिकार को ध्वस्त करने और कैंपस को फिर से लोकतांत्रिक और पारदर्शी सार्वजनिक दायरे में लाने का एक मजबूत प्रयास है।

मुख्य प्रस्तावित संरचनात्मक बदलाव:

  • 'दाता' के विशेषाधिकार की समाप्ति: परिच्छेद १ के बुँदा २ (ग) में प्रेम प्रकाश खेतान और उनके वारिसों को सर्वोच्च 'दाता' मानकर विशेष अधिकार सौंपने की व्यवस्था को पूरी तरह से हटाने का प्रस्ताव है।

  • लोकतांत्रिक कैंपस सभा: कैंपस सभा का गठन अब दाता की मर्जी या पर्चियों से नहीं, बल्कि पूर्ण रूप से 'चुनाव या लोकतांत्रिक निर्वाचन' के माध्यम से होगा। साथ ही आम सभा के सदस्यों की संख्या २1 से बढ़ाकर ५1 की जाएगी।

  • स्थानीय निकायों की जवाबदेही: नई प्रबंधन समिति में मनमाने चेहरों को हटाकर जिम्मेदार सार्वजनिक पदों के व्यक्तियों जैसे गुठी संस्थान प्रमुख, वीरगंज महानगरपालिका के मेयर, जिला समन्वय समिति के प्रमुख, उद्योग वाणिज्य संघ के अध्यक्ष और स्थानीय वार्ड अध्यक्ष को शामिल किया जाएगा।

  • फंडिंग का पारदर्शी संचालन: अध्यक्ष के सीधे नियंत्रण वाले 'मुख्य कोष' (Main Fund) के एकाधिकार को पूरी तरह खत्म कर दिया गया है। अब बैंक खातों का संचालन केवल कैंपस प्रमुख और मुख्य लेखा अधिकारी के संयुक्त हस्ताक्षरों से ही पारदर्शी तरीके से किया जा सकेगा।

  • अधिकारों की कानूनी गारंटी: कैंपस के भीतर आंतरिक संतुलन बनाए रखने और तानाशाही रोकने के लिए अनिवार्य रूप से स्वतंत्र छात्र संघ (Student Union), कर्मचारी संघ (Staff Union) और प्रोफेसर संघ (Professor Union) के गठन के नए बिंदु जोड़े गए हैं।

अब यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि वीरगंज के जागरूक स्थानीय नागरिक, छात्र संगठन और सरकारी नियामक निकाय इस ऐतिहासिक सामुदायिक धरोहर को किसी व्यक्ति विशेष की निजी महत्वाकांक्षा और व्यावसायिक गिद्ध-दृष्टि की बलि चढ़ने से रोकने के लिए आगे क्या कानूनी और दंडात्मक कदम उठाते हैं।