23 अक्टूबर 2026 (7 कातिक) को काठमांडू के राजनीतिक हलकों में अचानक हलचल पैदा करते हुए राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के अध्यक्ष रवि लामिछाने अपनी पत्नी निकिता पौडेल लामिछाने और भूमि सुधार तथा सहकारी मंत्री प्रतिभा रावल के साथ तीन दिवसीय दौरे पर भारत के लिए रवाना हो गए। उधर, उसी समय वित्त मंत्री डॉ. स्वर्णिम वाग्ले नेपाल-भारत द्विपक्षीय संबंधों और आर्थिक साझेदारी पर चर्चा करने के लिए नई दिल्ली में आयोजित 'एनडीटीवी वर्ल्ड समिट 2026' में भाग ले रहे हैं। एक तरफ पार्टी अध्यक्ष लामिछाने और मंत्री रावल उत्तर-पश्चिम भारत के उत्तराखंड स्थित कैंची धाम से लेकर उत्तर-पूर्व स्थित असम के कामाख्या देवी मंदिर तक की यात्रा पर निकले हैं, तो दूसरी तरफ वित्त मंत्री वाग्ले की दिल्ली के कूटनीतिक मंच पर उपस्थिति ने काठमांडू से दिल्ली तक नई राजनीतिक अटकलों को जन्म दे दिया है।

दौरे पर गए नेताओं और उनके निजी सचिवालय ने स्पष्ट किया है कि यह यात्रा विशुद्ध रूप से व्यक्तिगत, पारिवारिक और धार्मिक तीर्थयात्रा है, जिसमें कोई राजनीतिक मुलाकात या कोई खिचड़ी नहीं पक रही है। हालांकि, कूटनीतिक और राजनीतिक विश्लेषकों की नजर में इस दौरे के भीतर एक बेहद मसालेदार राजनीतिक खिचड़ी पकने के संकेत मिल रहे हैं। दिल्ली के तीखे गरम मसाले, कश्मीरी लाल मिर्च के राजनीतिक रंग, उत्तर-पूर्व के सरसों के तीखे स्वाद और जीरा-धनिया की सुगंध की तरह विभिन्न स्वादों और रणनीतियों को मिलाकर पर्दे के पीछे कूटनीतिक पकवान तैयार किया जा रहा है। भले ही जुबान से 'कुछ न पकने' का दावा किया जा रहा हो, लेकिन भारतीय प्रतिष्ठान और शक्ति केंद्रों के साथ यह नजदीकी नेपाली राजनीति के चूल्हे के नीचे नई चिंगारी सुलगाती साफ दिख रही है।

इस बीच, लामिछाने की इस भारत यात्रा को लेकर आम जनता और राजनीतिक हलकों में कई सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ आलोचकों का कहना है कि अतीत की गलतियों और पापों को धोने के लिए भारतीय धार्मिक स्थलों की शरण ली गई है। सवाल यह उठ रहा है कि अगर मकसद सिर्फ धार्मिक आस्था, मन्नत पूरी करना और पाप धोना ही था, तो अपने ही देश के मुक्तिनाथ, पशुपतिनाथ, वराहक्षेत्र और बुढासुब्बा जैसे पवित्र व ऐतिहासिक धार्मिक धामों को छोड़कर सीमा पार के मंदिरों में जाने की जरूरत क्यों पड़ी? स्वदेशी आस्था के केंद्रों को दरकिनार कर विदेशी पीठों के दर्शन करने जाने को कई लोग राजनीतिक कार्ड के रूप में भी देख रहे हैं।

यह उच्चस्तरीय गहमागहमी ऐसे संवेदनशील समय में हो रही है, जब नेपाल में त्योहारों के तुरंत बाद सरकार के खिलाफ बड़े विरोध प्रदर्शनों की तैयारी की खबरें हैं। छठ के बाद संभावित विरोध प्रदर्शनों, राजनीतिक समीकरणों की अटकलों और असंतुष्ट युवाओं के हालिया उभार ने सत्ता पक्ष को सतर्क कर दिया है। आगामी आंदोलनों की तपिश को देखते हुए राज्य की खुफिया एजेंसियों और सुरक्षा तंत्रों ने पुराने व अनुभवी राजनेताओं से लेकर हाल ही में उभर रहे जेन-जी (Gen Z) युवा नेताओं तक को कड़ी निगरानी में रखा है। राष्ट्रीय अनुसंधान विभाग, नेपाल पुलिस और सशस्त्र पुलिस बल ने संदिग्ध गतिविधियों में शामिल नेताओं का व्यक्तिगत बायोडाटा तैयार कर लिया है और स्थिति तनावपूर्ण होने पर किसी को भी किसी भी समय हिरासत में लिया जा सकता है। इस घरेलू राजनीतिक सरगर्मी और सख्त निगरानी के बीच भारत में हो रही इस उच्चस्तरीय मौजूदगी और शक्ति संतुलन का खेल आने वाले दिनों में नेपाली राजनीति में क्या नया रंग दिखाएगा, यह देखना बाकी है।

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