मिथिला और मधेस के क्षेत्रों में आज 'जुड शीतल' पर्व पारंपरिक हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। प्रकृति, सामाजिकता और सह-अस्तित्व के गहरे संबंधों को दर्शाने वाला यह त्योहार छठ और होली की तरह ही प्रकृति पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।

नया वर्ष के दूसरे दिन मनाए जाने वाले इस उत्सव में बुजुर्ग अपने से छोटों के सिर पर जल डालकर उन्हें 'शीतलता' और सुखद जीवन का आशीर्वाद देते हैं। उत्सव का एक अन्य आकर्षण चेहरे पर मिट्टी लगाना है। सांसद मनीष झा के अनुसार, यह मिट्टी जाति, लिंग या धर्म के भेदों को मिटाकर पूरे समाज को एक सूत्र में पिरोने का काम करती है।

गर्मी के मौसम की शुरुआत के साथ ही यह पर्व जल संरक्षण का संदेश भी देता है। इस अवसर पर लोग सामूहिक रूप से कुओं, तालाबों और जलाशयों की सफाई करते हैं ताकि जल का संचय किया जा सके। स्थानीय निवासियों के लिए यह प्रकृति के साथ अपने संबंधों को फिर से जीवित करने का एक वार्षिक अनुष्ठान है।

जनकपुरधाम की मिट्टी का अपना ऐतिहासिक महत्व है, क्योंकि इसे माता सीता की जन्मस्थली माना जाता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों से इस लुप्त होती संस्कृति को संस्थागत रूप से बढ़ावा दिया जा रहा है। पंचतत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) में मिट्टी का स्थान सर्वोपरि है, जो शरीर को बढ़ती गर्मी से राहत प्रदान करती है।

प्राचीन समय में 'धुरखेल' के नाम से प्रसिद्ध इस परंपरा में लोग एक-दूसरे पर मिट्टी और कीचड़ लगाकर खुशियां मनाते थे। पूर्वजों द्वारा तिल मिश्रित जल से अभिषेक करने की यह प्रथा न केवल आशीर्वाद का प्रतीक है, बल्कि यह परिवार और समाज में अपनत्व की भावना को भी मजबूत करती है।