नेपाल के राजनीतिक इतिहास में एक नया अध्याय लिखते हुए राष्ट्रिय स्वतन्त्र पार्टी (RSP) ने दशकों पुराने स्थापित दलों का वर्चस्व समाप्त कर दिया है। साल 1991 के बाद पहली बार किसी नई शक्ति ने नेपाली कांग्रेस और एमाले जैसे दिग्गजों को हाशिए पर धकेल दिया है। जहां RSP दो-तिहाई बहुमत के करीब है, वहीं कांग्रेस 35 और एमाले 25 सीटों तक सीमित रह गए हैं। लेकिन इस बड़ी जीत के बाद भी सत्ता की चाबी पूरी तरह RSP के हाथ में नहीं है।
सदन में प्रचंड लहर के बावजूद, RSP को राष्ट्रीय सभा और संवैधानिक परिषद में भारी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। राष्ट्रीय सभा में अभी भी नेपाली कांग्रेस 25 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है, जबकि माओवादी केंद्र 18 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर है। राष्ट्रपति राम चंद्र पौडेल का कांग्रेस से होना भी RSP सरकार के लिए विधायी बाधाएं खड़ी कर सकता है। ऐसे में माओवादी अध्यक्ष प्रचंड एक बार फिर अपरिहार्य शक्ति के रूप में उभरे हैं।
पूर्वी रुकुम से जीत दर्ज करने के बाद प्रचंड ने स्पष्ट कर दिया है कि उन्हें कम सीटों की वजह से कमतर आंकना भारी पड़ सकता है। उन्होंने RSP को "जीत के अहंकार" से बचने की सलाह देते हुए खुद को संसद का सबसे वरिष्ठ नेता बताया है। RSP के नेतृत्व ने भी संकेत दिए हैं कि वे कांग्रेस और एमाले के बजाय माओवादी केंद्र के साथ तालमेल बिठाने के पक्ष में हैं।
रणनीतिक गलियारों में चर्चा है कि RSP संवैधानिक परिषद में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए माओवादियों को डिप्टी स्पीकर का पद दे सकती है। सुशासन के मुद्दे पर पिछली सरकार में साथ काम कर चुके इन दोनों दलों के बीच फिर से तालमेल बैठने की संभावना अधिक है। कुल मिलाकर, RSP के लिए प्रचंड का साथ मजबूरी भी है और जरूरत भी, ताकि नई सरकार बिना किसी संवैधानिक गतिरोध के काम कर सके।