नेपाल की सत्ता की कमान संभालने वाले बालेन शाह के लिए पहला महीना काफी उतार-चढ़ाव भरा रहा है। 'जेन-जी' के समर्थन से हिमालयी राष्ट्र की बागडोर थामने वाले शाह अब अपनी ही सरकार के भीतर और सीमावर्ती राज्यों में विरोध का सामना कर रहे हैं। जिस 'रोटी-बेटी' के रिश्ते को नई ऊंचाइयों पर ले जाने का वादा किया गया था, वह वर्तमान नीतियों के कारण तनावपूर्ण होता दिख रहा है।

राजनीतिक मोर्चे पर, गृह मंत्री सुदन गुरुंग के इस्तीफे और श्रम मंत्री दीप कुमार साह की बर्खास्तगी ने शाह की प्रशासनिक स्थिरता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। विश्लेषकों का मानना है कि अनुभव की कमी और कठोर फैसलों के कारण सरकार में दरारें दिखाई दे रही हैं। लेकिन इससे भी गंभीर मुद्दा भारत के साथ लगी सीमा पर पैदा हुआ आर्थिक गतिरोध है।

बालेन शाह सरकार ने भारतीय बाजारों से खरीदे गए 100 नेपाली रुपए से अधिक के सामान पर 5 से 80 फीसदी तक कस्टम ड्यूटी लगाने का कड़ा फैसला लिया है। इस आदेश के बाद बीरगंज, नेपालगंज और विराट नगर जैसे व्यापारिक केंद्रों में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। सीमावर्ती क्षेत्रों के लोग, जो अपनी बुनियादी जरूरतों और दवाओं के लिए भारतीय कस्बों पर निर्भर हैं, इस सीमा शुल्क को 'अन्यायपूर्ण' बता रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि उपहारों और दैनिक वस्तुओं पर भी टैक्स वसूलना सदियों पुराने रिश्तों का अपमान है।

सरकार ने राजस्व बढ़ाने के लिए भारतीय पंजीकरण वाले वाहनों पर भी पाबंदियां लगाई हैं, जिससे आम जनता में भारी नाराजगी है। नेपाली कांग्रेस ने इस फैसले को तुरंत वापस लेने की मांग की है। वहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शाह की 'समदूरी' नीति की भी परीक्षा हो रही है। हालांकि उन्होंने दिल्ली का निमंत्रण स्वीकार किया है, लेकिन यात्रा की तारीखों पर अभी भी सस्पेंस बरकरार है।

कहा जा रहा है कि प्रधानमंत्री भारत और चीन दोनों पड़ोसी देशों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर बढ़ती महंगाई और पेट्रोल के दामों (225 NPR) ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि बालेन शाह अपनी घरेलू चुनौतियों और विदेश नीति के इस जटिल भंवर से नेपाल को कैसे बाहर निकालते हैं।


साभार: डीडब्ल्यू हिन्दी