नेपाल के शीर्ष पुलिस अधिकारी ने देश की न्याय प्रणाली और सामाजिक मानसिकता में गहराई तक पैठी कमियों पर तीखा प्रहार किया है। अंतर्राष्ट्रीय रंगभेद उन्मूलन दिवस के अवसर पर बोलते हुए, पुलिस महानिरीक्षक (IGP) दान बहादुर कार्की ने इस बात पर गहरा दुख व्यक्त किया कि साल 2026 (2082 विक्रम संवत) के इस आधुनिक युग में भी समाज जाति और रंगभेद जैसी पिछड़ी मानसिकता से जूझ रहा है।
आईजीपी कार्की के अनुसार, राष्ट्रीय सुरक्षा के मायने अब केवल भौतिक सुरक्षा तक सीमित नहीं रहने चाहिए। उन्होंने "मानव सुरक्षा" के एक व्यापक ढांचे की वकालत की, जिसमें एक बच्चे के भ्रूण से लेकर उसके पोषण, स्वास्थ्य और समग्र शिक्षा तक की जिम्मेदारी राज्य को उठानी चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि हर इंसान की 'अंतर्निहित गरिमा' (Inherent Dignity) सर्वोपरि है। हालांकि संविधान और कानून में समानता के प्रावधान मौजूद हैं, लेकिन व्यक्ति, संस्थाओं और राज्य के स्तर पर उनके व्यावहारिक कार्यान्वयन में भारी कमी है।
सामाजिक विसंगतियों पर कड़ा प्रहार करते हुए, पुलिस प्रमुख ने मीडिया और विज्ञापनों में गोरापन निखारने वाले उत्पादों के प्रचार की आलोचना की। उन्होंने गोरी त्वचा के प्रति समाज के अस्वस्थ जुनून पर सवाल उठाते हुए इसे एक विकृत व्यक्तिगत और सामूहिक मानसिकता का परिणाम बताया, जो भेदभाव को बढ़ावा देती है।
इसके अलावा, कार्की ने स्पष्ट रूप से स्वीकार किया कि राज्य के ढांचे में कई ऐसी 'संस्थागत बाधाएं' (Bottlenecks) मौजूद हैं, जो दलित समुदाय को न्याय प्राप्त करने से रोकती हैं। उन्होंने माना कि पुलिस बल भी इसी समाज का हिस्सा है, इसलिए कानून लागू करने वाली एजेंसियों के भीतर भी सकारात्मक और व्यावहारिक बदलाव लाना बेहद जरूरी है।
उन्होंने सांसदों से आग्रह किया कि नए कानून बनाते समय इन बुनियादी कमियों को दूर करने पर विशेष ध्यान दिया जाए। इसके साथ ही, उन्होंने शिक्षा प्रणाली में सुधार की मांग करते हुए कहा कि पाठ्यक्रमों में बचपन से ही समानता और न्याय के मूल्य शामिल किए जाने चाहिए। यह स्पष्ट है कि हाशिए पर पड़े वर्गों के लिए सच्ची समानता केवल नए कानून बनाने से नहीं, बल्कि समाज के गहरे सांस्कृतिक पूर्वाग्रहों को खत्म करने से ही हासिल की जा सकती है।