नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) के भीतर नेतृत्व को लेकर जारी घमासान अब बेहद गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। पार्टी की सचिवालय बैठक में अध्यक्ष केपी शर्मा ओली ने उन्हें पद से हटाने की मांग कर रहे विरोधी गुट को खुली चुनौती देते हुए पूछा है कि वे उन्हें किस प्रक्रिया के तहत हटाना चाहते हैं।
गत 17 मई से जारी इस महत्वपूर्ण बैठक में जब अधिकांश सचिवालय सदस्यों ने संगठन के पुनर्गठन और नेतृत्व में बदलाव की वकालत की, तो अध्यक्ष ओली ने कड़ा रुख अपनाया। अपने ही करीबी नेताओं को विपक्ष में खड़ा देख ओली ने नेतृत्व परिवर्तन की कानूनी वैधता पर सवाल उठाए।
बैठक के सूत्रों के अनुसार, ओली ने तर्क दिया कि राष्ट्रीय महाधिवेशन संपन्न हुए अभी छह महीने भी नहीं बीते हैं, ऐसे में दोबारा महाधिवेशन या विशेष महाधिवेशन की बातें करना तर्कसंगत नहीं है। उन्होंने तीन महीने पहले हुए निचले स्तर के अधिवेशनों की प्रासंगिकता पर भी सवाल उठाया।
नेताओं द्वारा दिए जा रहे इस्तीफे के सुझावों को खारिज करते हुए ओली ने स्पष्ट किया कि वे किसी के समझाने या दबाव में आकर पद नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने दावा किया कि वे एमाले को उसके पुराने मजबूत स्वरूप में वापस लाने में पूरी तरह सक्षम हैं और नेतृत्व की कमान उन्हीं के पास रहेगी।
सचिवालय में बढ़ते विरोध के बीच ओली ने अब सीधे केंद्रीय समिति का सामना करने का मन बना लिया है। उन्होंने बैठक में संदेश दिया कि यदि उनके नेतृत्व पर सवाल हैं, तो इस मामले को केंद्रीय समिति में ले जाया जाए, जहां वे प्रत्येक सदस्य से व्यक्तिगत रूप से बात करेंगे।
इस बीच, बैठक को जल्दी समाप्त करने के प्रयासों को लेकर भी नेताओं में तीखी बहस हुई। शनिवार को जब ओली ने चर्चा को समेटना चाहा, तो नेता पृथ्वीसुब्बा गुरुंग ने इसका कड़ा विरोध करते हुए आरोप लगाया कि दूसरों को बोलने का मौका दिए बिना बैठक खत्म की जा रही है, जिसके बाद शनिवार का सत्र बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो गया।
अब तक सचिवालय के 14 सदस्य इस विषय पर अपने विचार रख चुके हैं, जिनमें से 10 से अधिक सदस्यों ने पार्टी के पुनर्गठन की मांग का समर्थन किया है। यहाँ तक कि उप-महासचिव योगेश भट्टराई ने ओली को पद से इस्तीफा देने की सलाह भी दे डाली है।
यह विवादित बैठक आज रविवार को भी जारी रहेगी, जिसमें अध्यक्ष ओली को सदस्यों के सवालों का औपचारिक जवाब देना है। बैठक में अभी सचिव शेरधन राई, यामलाल कंदेल, भानुभक्त ढकाल और खगराज अधिकारी जैसे वरिष्ठ नेताओं का अपनी बात रखना बाकी है।