सुनिता साह - मधेस और मधेसी जनता आखिर कब तक राज्य द्वारा दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार सहने को मजबूर होगी? देश की आर्थिक राजधानी और मधेस के एकमात्र महानगर बीरगंज को तबाह करने के लिए राज्य कमर कसकर लगा हुआ दिखाई दे रहा है।

हेटौड़ा में 25 गज, काठमांडू के कलंकी-त्रिपुरेश्वर सड़क खंड में 16 मीटर, और बीरगंज में 25 मीटर! आखिर सर्वोच्च अदालत का यह किस प्रकार और प्रकृति का न्याय है? इसने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

बीरगंज के पथलैया से मितेरी पुल तक के त्रिभुवन राजपथ (H02) को दिनांक 2072/05/21 के मंत्रिपरिषद के निर्णय द्वारा पथलैया-सिरसिया (बहुअरी) स्थित सूखा बंदरगाह (ICD) तथा एकीकृत जांच चौकी (ICP) सीमा शुल्क की ओर स्थानांतरित (शिफ्ट) कर दिया गया था। फिलहाल उसी मार्ग पर 25 मीटर 6 लेन का त्रिभुवन राजपथ निर्माण संपन्न होकर संचालन में भी आ चुका है। ऐसी स्थिति में बीरगंज शहर के प्रवेश बिंदु गंडक से मितेरी पुल तक पुनः 25 मीटर (165 फीट) राजमार्ग का ही मापदंड लागू करने की कोशिश करना कितना व्यावहारिक है?

बीरगंज में पर्याप्त वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध होते हुए भी घनी आबादी वाले ऐतिहासिक एवं प्राचीन शहर तथा व्यापार-व्यवसाय को ही ध्वस्त करने और सड़क के दोनों ओर के मकान मालिकों को बेघर करने की मंशा न्यायसंगत नहीं हो सकती। शहर के बीच से ही राजमार्ग का मापदंड जबरन लागू करना राज्य की क्रूरता और अपरिपक्वता की उपज है।

बीरगंज महानगरपालिका द्वारा 2075 साल के नगर सभा के दूसरे महाधिवेशन से पारित प्रस्ताव के अनुसार हाल ही में (2083 असार में) प्रधानमंत्री, भौतिक पूर्वाधार तथा यातायात मंत्रालय और संघीय मामले तथा सामान्य प्रशासन मंत्रालय को 15 मीटर का 'राइट ऑफ वे' (Right of Way) कायम रखकर सड़क विस्तार करने का पत्र भेजा गया था। लेकिन सड़क विभाग के महानिदेशक द्वारा दो महीने से अधिक समय से उस पत्र को दबाकर रखना मधेस और मधेसी जनता पर हो रहे चरम भेदभाव और अन्याय को पुनः साबित करता है।

मधेसी समुदाय से होने के कारण ही क्या हमें हमेशा राज्य से दूसरे दर्जे के नागरिक जैसा व्यवहार सहना पड़ेगा? राज्य का चौथा स्तंभ कहे जाने वाले मीडिया जगत, नागरिक समाज तथा बीरगंज महानगरपालिका के प्रमुख राजेशमान सिंह जी से मैं इस विषय पर यथाशीघ्र न्यायसंगत पहल और जांच करके पीड़ित हजारों नागरिकों को संविधान प्रदत्त अधिकार दिलाने की हार्दिक अपील करता हूं।