इस्लामाबाद द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता के जरिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर कूटनीतिक बढ़त हासिल करने के दावों के बीच पाकिस्तान की नागरिक-सैन्य हाइब्रिड सरकार पर घरेलू स्तर पर असहमति की आवाजों को बर्बरता से दबाने के गंभीर आरोप लगे हैं।

एक तरफ प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सुर्खियां बटोर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान की जनता बढ़ती महंगाई, खाद्य और ईंधन संकट तथा राजनीतिक उथल-पुथल से बेहाल होकर सड़कों पर प्रदर्शन कर रही है। सरकार इन बुनियादी समस्याओं का समाधान करने के बजाय आतिंरिक संकटों को दबाने में लगी है।

राजनीतिक कार्यकर्ताओं, विशेषकर पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) से जुड़े लोगों को राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा घोषित किया जा रहा है। कश्मीर क्षेत्र में महंगाई और नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे आम लोगों पर सेना द्वारा लाठीचार्ज, इंटरनेट पाबंदी, भोजन आपूर्ति में बाधा और छापेमार कार्रवाई जैसे सख्त कदम उठाए गए हैं। हालिया संवैधानिक संशोधनों के बाद न्यायपालिका की शक्तियां भी कमजोर कर दी गई हैं।

मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के अनुसार सरकार आलोचकों के खिलाफ कड़े आपराधिक और आतंकवाद-रोधी कानूनों को हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। घरेलू स्तर पर लोकतांत्रिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों को कुचलने वाली सरकार अंतरराष्ट्रीय शांति वार्ता में अपनी नैतिक विश्वसनीयता गंवाती नजर आ रही है।