आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए राजनीतिक दलों ने सुशासन और भ्रष्टाचार विरोध (GGAC) को विशेष महत्व दिया है। Gen-Z आंदोलन के बाद यह मुद्दा अधिक चर्चित बन गया है। इस आंदोलन की दो मुख्य मांगें थीं—सोशल मीडिया पर सरकारी प्रतिबंध हटाना और सुशासन व भ्रष्टाचार नियंत्रण सुनिश्चित करना। सरकार ने प्रतिबंध में ढील दी, लेकिन GGAC की मांग अभी भी बनी हुई है।
पूर्व GGAC एजेंडा
लगभग दो दशकों से इस क्षेत्र में काम करने के कारण मैं राजनीतिक दलों के इस एजेंडा से स्वयं को अलग नहीं रख सकता। 2008 के पहले संविधान सभा चुनाव से ही मैं इसे देखता आया हूँ।
2008 में मैंने प्रमुख दलों के घोषणापत्रों में भ्रष्टाचार विरोधी प्रावधानों का अध्ययन किया था, जो ‘द काठमांडू पोस्ट’ में प्रकाशित हुआ। 2022 में 11 दलों को शामिल करते हुए विस्तृत अध्ययन किया गया, जिसके निष्कर्ष CIAA स्मारिका 2023 में प्रकाशित हुए।
2008 से 2022 के बीच दलों में सामग्री और प्रस्तुति के स्तर पर सुधार हुआ है, लेकिन परिणामों में नहीं। लगभग सभी दलों ने GGAC को शामिल किया है, परंतु दृष्टिकोण अलग है—छोटे दल अधिक कठोर नीतियों के पक्षधर हैं, जबकि बड़े दल अपेक्षाकृत नरम हैं। फिर भी नवाचार का अभाव बना हुआ है और पुराने उपायों पर ही निर्भरता है।
ब्रिटेन का नया कानून
ब्रिटेन में ऐसा प्रावधान है कि यदि कोई संस्था भ्रष्टाचार रोकने के उपाय लागू नहीं करती, तो यह भी अपराध माना जाता है। नेपाल के संदर्भ में यह दृष्टिकोण अभी विकसित नहीं हुआ है।
दंडात्मक उपायों पर जोर
घोषणापत्रों में दल कठोर दंडात्मक उपायों की होड़ में हैं—अवैध संपत्ति की जांच, संपत्ति जब्ती, दोषियों को आजीवन प्रतिबंध, उच्चस्तरीय आयोग गठन और ‘जीरो टॉलरेंस’ जैसी नीतियाँ प्रमुख हैं।
भ्रष्टाचार नियंत्रण की विशेषताएं
भ्रष्टाचार को पूरी तरह समाप्त नहीं किया जा सकता, केवल कम किया जा सकता है। दंडात्मक उपाय अल्पकालिक प्रभाव देते हैं, जबकि दीर्घकालिक समाधान रोकथाम में निहित है।
रोग या रोगी?
भ्रष्टाचार एक बीमारी है और भ्रष्ट व्यक्ति रोगी। केवल व्यक्ति को दंडित करने से समस्या का समाधान नहीं होता, बल्कि प्रणालीगत सुधार आवश्यक है।
बांग्लादेश का उदाहरण दर्शाता है कि पुराने मामलों में उलझने से संस्थाएं कमजोर हो जाती हैं। सफल रणनीति भविष्य पर केंद्रित होनी चाहिए।
सकारात्मक पहल
डिजिटल गवर्नेंस, ई-प्रोक्योरमेंट, नकदरहित प्रणाली और नागरिकों के अधिकारों को मजबूत करने जैसे प्रस्ताव सकारात्मक संकेत हैं।
राजनीतिक दलों में यह समझ बढ़ रही है कि सुशासन के बिना भ्रष्टाचार नियंत्रण संभव नहीं है।
अवैध संपत्ति की जांच
दलों की प्रमुख समस्या उनका दंडात्मक दृष्टिकोण है। अवैध संपत्ति की जांच सभी का साझा एजेंडा बन गया है।
नीतिगत भ्रष्टाचार
नीतिगत स्तर पर भ्रष्टाचार की जांच करना जटिल है, क्योंकि राजनीति और भ्रष्टाचार के बीच की सीमा स्पष्ट नहीं होती।
प्रदर्शन आधारित वित्तपोषण
भ्रष्टाचार नियंत्रण को विकास संसाधन से जोड़ने जैसे नवाचार अभी भी नजर नहीं आते। यदि जुर्माने का एक हिस्सा संस्थाओं को दिया जाए, तो उनकी कार्यक्षमता बढ़ सकती है।
नारायण मानन्धर