काठमांडू, 22 अप्रैल, 2026

आज कुछ सहकर्मियों ने गृह मंत्री से मिलने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने समय तय कर लिया था। मैंने भी सहमति जताई और निर्धारित समय से कुछ मिनट पहले ही गृह मंत्रालय पहुँच गया।

मंत्रालय परिसर में एक सफेद, भारतीय ब्रांड की महिंद्रा स्कॉर्पियो (बा प्र 01–002 झ 8119) खड़ी थी। आमतौर पर ऐसी एसयूवी विशेष ध्यान नहीं खींचतीं। लेकिन इस गाड़ी पर एक चीज़ असामान्य थी—स्टिकर हटाए जाने के बाद बचा हुआ स्पष्ट दाग।

यह गाड़ी भारत सरकार के सहयोग से उपलब्ध कराई गई थी, जिस पर ‘नेपाल-भारत सहयोग’ लिखा हुआ स्टिकर लगा था। स्टिकर हटा दिया गया था, लेकिन उसका दाग अभी भी वैसा ही दिख रहा था—मानो हटाने का काम अधूरा ही छोड़ दिया गया हो।

आज ही गृह मंत्री ने इस्तीफा दे दिया है और मंत्रालय की जिम्मेदारी अस्थायी रूप से प्रधानमंत्री के अधीन आ गई है। प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो अब ऐसे छोटे-बड़े कामों की अंतिम जिम्मेदारी भी शीर्ष नेतृत्व की निगरानी में आती है।

सरकारी संपत्ति पर किया गया कार्य राज्य की कार्यशैली को दर्शाता है। स्टिकर हटाने का आदेश किसने दिया, यह प्रश्न जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही प्रासंगिक यह प्रश्न भी है कि इसे व्यवस्थित रूप से लागू क्यों नहीं किया गया। जिम्मेदारी लेने और काम पूरा करने की संस्कृति में ऐसी सुस्ती सामान्य नहीं होनी चाहिए।

अंत में, प्रधानमंत्री जी को एक छोटा सा सुझाव—स्टिकर के दाग मिटाने के लिए किसी बड़ी नीति की आवश्यकता नहीं है, हार्डवेयर की दुकान पर 150 रुपये में तारपीन का तेल मिलता है; शायद आदेश देने से पहले इसे खरीदने का विचार किसी के मन में नहीं आया।