विवादास्पद बिचौलिए इनाम सापकोटा से जुड़े शक्ति प्रदर्शन और अनुचित प्रभाव के मामले ने नेपाल के प्रशासनिक और न्यायिक हलकों में हलचल मचा दी है, जिसके बाद शीर्ष स्तर पर जांच की मांग तेज हो गई है। सुशासन और कानून के शासन का वादा करके सत्ता में आई प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह की सरकार पर ही अब बिचौलियों की पहुंच और सांठगांठ को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश हरिप्रसाद फुयाल ने खुलासा किया कि सापकोटा ने न्यायिक प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करने का प्रयास किया था, जिसके बाद उन्होंने आरोपी की गिरफ्तारी के लिए प्रधानमंत्री कार्यालय में शिकायत दर्ज कराई। न्यायाधीश फुयाल ने सापकोटा से एक होटल में मुलाकात की बात भी स्वीकार की है। दूसरी ओर, पुलिस महानिरीक्षक (IGP) दान बहादुर कार्की ने पुष्टि की कि आरोपी को उनके सीधे आदेश पर गिरफ्तार किया गया था, जिसके बाद प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा पुलिस प्रमुख को पद से हटाने की चर्चाओं ने तूल पकड़ लिया है।
लीक हुए चैट रिकॉर्ड और तस्वीरों के अनुसार, सापकोटा खुद को प्रधानमंत्री का विशेष दूत बताकर विभिन्न व्यक्तियों से संपर्क साधता था। वह प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और उनके मुख्य सलाहकार कुमार बेन तक अपनी सीधी पहुंच दिखाकर प्रभाव जमाता था। इस मामले के तार कैबिनेट मंत्रियों और सत्तारूढ़ राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) के वरिष्ठ नेताओं से भी जुड़ते दिख रहे हैं।
इस घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए जेन-जी कार्यकर्ता अजय सोडारी ने कहा कि सुशासन का दावा करने वाली सरकार अपनी जवाबदेही से पीछे नहीं हट सकती। उन्होंने मांग की कि जांच की शुरुआत खुद प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह और उनके मुख्य सलाहकार कुमार बेन से होनी चाहिए। सोडारी ने एक अधिकार संपन्न न्यायिक आयोग या संसदीय समिति के गठन की पुरजोर मांग की है जो प्रधानमंत्री, सलाहकारों, मंत्रियों, न्यायाधीशों और पुलिस नेतृत्व की भूमिका की निष्पक्ष जांच कर सके।
इस पूरे प्रकरण में होने वाली निष्पक्ष जांच ही यह तय करेगी कि क्या नेपाल की प्रशासनिक व्यवस्था सचमुच पारदर्शी है और क्या कानून का शासन सभी पर समान रूप से लागू होता है।