राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (रास्वपा) के भीतर लंबे समय से जारी आंतरिक खींचतान और शीतयुद्ध अब धीरे-धीरे तीखी झड़प के रूप में सतह पर आने लगा है। विशेष रूप से दशैं, तिहार और छठ जैसे बड़े त्योहारों के खत्म होते ही सड़क आंदोलन और राजनीतिक सरगर्मी तेज होने के आकलनों के बीच रास्वपा के भीतर शक्ति संतुलन और गुटबाजी ने नया मोड़ ले लिया है। पार्टी के दो मुख्य स्तंभों—अध्यक्ष रवि लामिछाने और प्रधानमंत्री तथा वरिष्ठ नेता बालेन्द्र शाह के बीच की अंदरूनी टकराहट ने अब संसदीय अंकगणित से लेकर जनमत के समीकरण तक को उद्वेलित कर दिया है।

संसदीय दल में लामिछाने की मजबूत पकड़

पार्टी के संसदीय अंकगणित में बालेन्द्र शाह की तुलना में रवि लामिछाने अधिक मजबूत स्थिति में दिखाई दे रहे हैं और ध्रुवीकरण शुरू हो चुका है, जिसकी पुष्टि संसद के आंकड़े भी करते हैं। राजनीति के अनुभवी और चतुर खिलाड़ी माने जाने वाले पार्टी अध्यक्ष लामिछाने ने संसदीय दल पर अपनी मजबूत पकड़ बना ली है। फिलहाल रास्वपा के लगभग 120 सांसद खुले तौर पर अध्यक्ष लामिछाने के पक्ष में खड़े हैं। प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह से आसानी से मुलाकात या संपर्क न हो पाने तथा प्रधानमंत्री गुट द्वारा अपने सांसदों की समस्याओं और उपस्थिति पर विशेष ध्यान न देने की शैली के कारण अधिकांश सांसद स्वाभाविक रूप से सुलभ अध्यक्ष लामिछाने की ओर आकर्षित हुए हैं। संसदीय दल में अपने पक्ष में स्पष्ट बहुमत होने के कारण अध्यक्ष लामिछाने आंतरिक शक्ति नियंत्रण को लेकर काफी उत्साहित और आश्वस्त दिख रहे हैं।

जनमत के भरोसे खड़े बालेन शाह

दूसरी ओर, संसदीय अंकगणित में पिछड़ने के बावजूद प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह अपनी अलग रणनीतिक धरातल पर कायम हैं। आकलन के अनुसार बालेन के पक्ष में फिलहाल केवल 60 से 62 सांसद ही सीमित हैं। हालांकि, सांसदों की संख्या कम होने के बावजूद प्रधानमंत्री बालेन इस विश्लेषण से आश्वस्त हैं कि देश की बहुसंख्यक जनता और आम नागरिकों का अभूतपूर्व समर्थन उनके साथ है। "संसदीय अंकगणित में जो भी हो, आम जनता मेरे पक्ष में है" के मजबूत आत्मविश्वास के साथ बालेन ने खुद को जनमत के आधार पर शक्तिशाली माना है। इससे पार्टी के भीतर 'रवि के पक्ष में बहुमत सांसद, बालेन के पक्ष में बहुमत जनता' का नया विमर्श बन गया है।

त्योहारों के बाद और गहरा सकता है ध्रुवीकरण

फिलहाल दोनों पक्षों में खुलकर सामने न आए कुछ चतुर और अनिश्चित स्वभाव वाले सांसद दोनों तरफ रुख रखकर स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं, फिर भी पार्टी के भीतर रवि और बालेन गुट की स्पष्ट बाड़ाबंदी शुरू हो चुकी है। आने वाले दिनों में त्योहारों के बाद संभावित सड़क आंदोलन और राजनीतिक समीकरणों के साथ यह ध्रुवीकरण और भी स्पष्ट तथा प्रखर होना तय है। संसदीय अंकगणित की 'रवि शक्ति' और सड़क तथा जनमत की 'बालेन शक्ति' के बीच का यह आंतरिक संघर्ष आने वाले दिनों में नेपाली राजनीति और रास्वपा के भविष्य को किस दिशा में मोड़ता है, यह देखना बेहद दिलचस्प होगा।

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