नेपाल में युवा पीढ़ी के आंदोलन के बाद संपन्न चुनाव के माध्यम से दो-तिहाई बहुमत हासिल कर बालेन्द्र शाह के नेतृत्व में शक्तिशाली सरकार का गठन होने के साथ ही, इस परिवर्तन ने दुनिया भर में एक नया राजनीतिक संदेश दिया है। नेपाल के विद्रोह के तुरंत बाद मेडागास्कर और फ्रांस जैसे देशों में भी इससे मिलते-जुलते आंदोलन देखे गए हैं।
इस बीच, बालेन शाह के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा अपने कामकाज को अधिक प्रभावी बनाने के लिए नेपाल पुलिस और नेपाली सेना के प्रमुखों को बदलने की चर्चाएं तेज हो गई हैं। विशेष रूप से, नकली भूटानी शरणार्थी घोटाले की जांच में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले डॉ. मनोज कुमार केसी को पुलिस महानिरीक्षक और अनुपजंग थापा को सेनाध्यक्ष बनाने की कोशिश की बात कहते हुए सोशल मीडिया पर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।
हालांकि, सोशल मीडिया पर पुलिस महानिरीक्षक या सेनापति बनाने का 'मीडिया ट्रायल' और बहस जारी रहने के बावजूद सरकार ने उन्हें हटाने या बदलने का कोई आधिकारिक फैसला या प्रक्रिया शुरू नहीं की है। वर्तमान में नेपाली सेना का नेतृत्व सेनाध्यक्ष अशोक राज सिग्देल कर रहे हैं, जबकि नेपाल पुलिस की कमान पुलिस महानिरीक्षक दान बहादुर कार्की संभाल रहे हैं।
इस तरह की चर्चाओं के बारे में कुछ विश्लेषकों का दावा है कि यह सरकार पर दबाव बनाने या मीडिया ट्रायल करने के लिए फैलाया गया महज एक भ्रम है, जबकि कुछ का कहना है कि हालांकि सरकार काफी समय से नेतृत्व बदलना चाहती थी, लेकिन कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के कारण इसे आगे नहीं बढ़ा सकी।
देश के संवेदनशील राष्ट्रीय सुरक्षा निकायों के प्रमुखों के मुद्दे पर सोशल मीडिया पर इस तरह की बहस और अटकलों को गंभीरता से देखा जा रहा है। नेपाल के इतिहास में जब भी सरकार ने पशुपतिनाथ, राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष के मामले में अप्रत्याशित फैसले लेने की कोशिश की है, तब हमेशा गंभीर राजनीतिक और संवैधानिक संकट उत्पन्न हुआ है। हालांकि, नेपाल पुलिस के महानिरीक्षक अतीत में भी समय-समय पर बदलते रहे हैं।