पहलगाम में 2025 का हमला सिर्फ एक स्थानीय घटना नहीं थी। बाद में हुई जांच से पता चला कि यह एक बहुत बड़े, वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा था। कश्मीर के एक शांत मैदान में जो हुआ, वह हजारों मील दूर न्यूयॉर्क और सियोल जैसी जगहों पर हो रही गतिविधियों से जुड़ा था।
2025 के उत्तरार्ध में एक बड़ा घटनाक्रम तब सामने आया, जब आसिफ मर्चेंट नाम के व्यक्ति को संयुक्त राज्य अमेरिका में गिरफ्तार किया गया। वह कथित तौर पर सीमा पार के हैंडलर से जुड़ा था और हाई-प्रोफाइल अमेरिकी अधिकारियों को निशाना बनाने की साजिश में शामिल था। उसी समय के आसपास, एक अन्य व्यक्ति, मोहम्मद शाहजेब खान पर न्यूयॉर्क शहर के एक यहूदी केंद्र में सामूहिक गोलीबारी की योजना बनाने का आरोप लगा था। इन मामलों ने दिखाया कि ऐसे नेटवर्क एक क्षेत्र तक सीमित नहीं हैं—वे वैश्विक स्तर पर काम कर सकते हैं और विभिन्न देशों को निशाना बना सकते हैं।
इन नेटवर्कों की पहुंच पूर्वी एशिया में भी देखी गई। दक्षिण कोरिया में, अधिकारियों ने एक संदिग्ध लश्कर-ए-तैयबा (LeT) गुर्गे को गिरफ्तार किया। जांचकर्ताओं ने पाया कि ऐसे समूह विदेशों में चुपचाप सहायता प्रणाली बनाने के लिए व्यापारिक संबंधों और प्रवासी समुदायों का उपयोग करते हैं। इन्हें अक्सर "स्लीपर सेल" कहा जाता है—वे लंबे समय तक निष्क्रिय रह सकते हैं लेकिन जरूरत पड़ने पर सक्रिय किए जा सकते हैं। कभी-कभी, उनका उपयोग प्रत्यक्ष हमलों के बजाय फंडिंग, योजना या भर्ती के लिए किया जाता है।
यह सब एक स्पष्ट वास्तविकता की ओर इशारा करता है: खतरा एक स्थान तक सीमित नहीं है। एक क्षेत्र में जो शुरू होता है वह बहुत जल्दी सीमाओं के पार फैल सकता है। इसी वजह से देश अब मिलकर काम कर रहे हैं। भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका की एजेंसियां और इंटरपोल जैसे अंतर्राष्ट्रीय निकाय ऐसे नेटवर्कों को ट्रैक करने और रोकने के लिए सहयोग बढ़ा रहे हैं।
संदेश सरल है—आज आतंकवाद वैश्विक है। कोई भी देश अकेले इससे नहीं निपट सकता, और कोई भी स्थान खुद को पूरी तरह सुरक्षित नहीं मान सकता।