लेखक - ज्ञानमित्र - 

 

१. एक कल्पना से शुरुआत करें

कल्पना कीजिए, हरिद्वार के एक घर में एक छोटे बच्चे की उंगली की नोक दरवाज़े में दबकर कट जाती है। माता-पिता जल्दी में डॉक्टर के पास पहुँचते हैं। डॉक्टर घाव तो बाँध देते हैं, पर कहते हैं—"यह उंगली की नोक अब दोबारा नहीं आएगी। इंसान का शरीर यह कर नहीं सकता।"

उसी दिन, उसी समय, मेक्सिको की एक झील में एक छोटा जीव मुस्कुरा रहा है। उसका एक पूरा हाथ कटा हुआ है। दो हफ्ते बाद उसी जगह पर एक छोटी कोपल उगती है। दो महीने बाद वह कोपल एक पूरा हाथ बन जाती है—हड्डी, मांसपेशी, नस, नाखून और त्वचा सहित। निशान भी नहीं रहता।

इस जीव का नाम है एक्सोलोटल (Axolotl; वैज्ञानिक नाम—Ambystoma mexicanum)।

एक ही घटना में दो अलग निर्णय—एक ओर शरीर कहता है, "अब खत्म हुआ," और दूसरी ओर शरीर कहता है, "मैं इसे फिर बनाऊँगा।" ऐसा क्यों होता है? यही प्रश्न वैज्ञानिकों को सदियों से परेशान कर रहा है, और २०२६ के दो अध्ययनों ने इसका एक बड़ा उत्तर दिया है।

२. नाम में ही कहानी है

एक्सोलोटल का नाम सुनकर आश्चर्य होता है। यह नाम एज़्टेक (Aztec) सभ्यता से लिया गया है। एज़्टेक देवता शोलोट्ल (Xólotl) थे—रूप बदलने, मृत्यु और अग्नि के देवता। कथा कहती है कि देवताओं ने स्वयं को बलि देने का निर्णय लिया, तब शोलोट्ल भागना चाहते थे और अपने बचाव के लिए पानी में एक छोटे सैलामैंडर में बदल गए। इसीलिए उन्होंने इसे एक्सोलोटल कहा—अर्थात् "पानी का देवता"।

एक्सोलोटल की कोशिकाएँ अपनी मूल स्थिति याद रखने की क्षमता रखती हैं, जिसे विज्ञान में पोज़िशनल मेमोरी (Positional Memory) कहा जाता है। यही स्मृति नए हाथ में कौन-सा भाग कहाँ बनेगा, यह निर्धारित करती है।

नाम में ही रूप परिवर्तन की कहानी है। आज विज्ञान भी उसी तथ्य की पुष्टि कर रहा है—यह जीव रूप बदलने में सक्षम है।

एक्सोलोटल मेक्सिको की सोचिमिल्को (Xochimilco) झील में पाया जाने वाला एक विशेष सैलामैंडर है। एक और आश्चर्य की बात यह है कि यह कभी बड़ा नहीं होता। अन्य सैलामैंडर बच्चे से बड़े होने के बाद पानी से निकलकर ज़मीन पर चले जाते हैं, पर एक्सोलोटल जीवन भर बच्चे जैसा पानी में ही रहता है। विज्ञान में इसे नियोटेनी (Neoteny) कहा जाता है—अर्थात् वयस्क अवस्था में पहुँचकर भी बाल्यकाल की विशेषताएँ बनाए रखना। संभव है कि यही बाल्यकाल को बनाए रखने की क्षमता इसे अपने अंग दोबारा बनाने की शक्ति देती हो।

३. सरल विज्ञान: घाव कैसे फिर से ठीक होता है?

हम अपना हाथ काटते हैं तो क्या होता है? रक्त आता है, रक्त जमता है, धीरे-धीरे त्वचा आती है और निशान बन जाता है। शरीर का पहला उद्देश्य होता है—जल्दी घाव बंद करो, जान बचाओ।

एक्सोलोटल क्या करता है? उसका रक्त भी जम जाता है, पर उसके बाद एक अलग कहानी शुरू होती है।

घाव के किनारे की कोशिकाएँ—हड्डी की कोशिकाएँ, मांसपेशी की कोशिकाएँ, त्वचा की कोशिकाएँ—अपनी पहचान भूल जाती हैं। हड्डी की कोशिका कहती है, "मैं अब हड्डी नहीं हूँ, मैं फिर से अपरिपक्व कोशिका बन जाऊँगी।" इस प्रक्रिया को विज्ञान में डिडिफरेंशिएशन (Dedifferentiation) कहते हैं। इसका अर्थ है—विभेदन का हटना या पुनः अपरिपक्व होना। यानी एक परिपक्व, निर्धारित काम वाली कोशिका (जैसे हड्डी की कोशिका) अपनी पहचान भूलकर फिर कच्ची, बहुमुखी कोशिका बनने की स्थिति में लौटती है।

घाव होने के बाद, घाव की सतह पर एक विशेष त्वचा बनती है, जिसे वाउन्ड एपिडर्मिस (Wound Epidermis) कहा जाता है। इसके बाद उसकी नोक पर एपिकल एपिथेलियल क्याप (Apical Epithelial Cap, AEC) बनती है, जो ब्लास्टेमा को संकेत देती है।

इस प्रक्रिया में नस की भूमिका भी महत्वपूर्ण है; नसों द्वारा दिए जाने वाले विशेष संकेत AEC के बनने और ब्लास्टेमा के बने रहने में मदद करते हैं।

ये अपरिपक्व हुई कोशिकाएँ घाव के ऊपर जमा होकर एक सफेद नोक बनाती हैं, जिसे ब्लास्टेमा (Blastema) कहा जाता है। सफल पुनर्जनन के लिए ब्लास्टेमा में हाथ के अगले और पीछे के दोनों पक्षों की कोशिकाएँ चाहिए; ये दोनों पक्ष की कोशिकाएँ एक-दूसरे से संवाद करके नया हाथ बनाती हैं।

ब्लास्टेमा के लिए मैं आपको कुम्हार का उदाहरण देता हूँ। कुम्हार के चाक में कच्ची मिट्टी रखी होती है। उस मिट्टी से दीया भी बन सकता है, गिलास भी बन सकता है, घड़ा भी बन सकता है। क्या बनेगा, यह कुम्हार के हाथों द्वारा दिए गए आकार पर निर्भर करता है।

ब्लास्टेमा भी वही कच्ची मिट्टी है। कुम्हार का हाथ यानी उसके आसपास के संकेत—कौन-सा जीन सक्रिय होगा, कौन-सा प्रोटीन कहाँ जाएगा। एक्सोलोटल का कुम्हार बहुत निपुण है, इसलिए वह कच्ची मिट्टी से पूरा हाथ बना देता है। इंसान का कुम्हार जल्दबाज़ है, इसलिए मिट्टी को जल्दी से बाँधकर निशान बना देता है।

२०२५ में वियना की एक प्रयोगशाला में एक रोचक प्रयोग हुआ। वैज्ञानिकों ने एक्सोलोटल के एक हाथ में जानबूझकर दूसरे हाथ के पीछे की कोशिकाओं को चिपका दिया। क्या हुआ? उसी स्थान पर दूसरा हाथ उग आया—अर्थात् एक ही जगह पर दो हाथ। इसने यह दिखाया कि ब्लास्टेमा का नक्शा पढ़ा जा सकता है। गलत नक्शा दिया तो शरीर उलझ जाता है और गलत अंग बनाता है। इसलिए यह प्रयोग दिखाता है कि नक्शा कितना महत्वपूर्ण है।

यह बात पहली बार १९७८ में ही सिद्ध हुई थी, जब वैज्ञानिकों ने एक्सोलोटल के ब्लास्टेमा को घुमाकर दूसरा हाथ उगाना संभव होने का प्रदर्शन किया। परंतु इसका आणविक कारण २०२५ में वियना की IMBA प्रयोगशाला की एली तनाका और उनकी टीम ने पता लगाया—पीछे की कोशिकाओं में Hand2 नामक जीन सक्रिय रहता है, जो पोज़िशनल मेमोरी बनाए रखता है। यही Hand2 ब्लास्टेमा को बताता है कि कहाँ क्या बनाना है।

४. जुलाई २०२६ में क्या नया मिला? हमारे शरीर में भी नक्शा है

अब आता है सबसे नया विषय।

हमने सोचा था कि एक्सोलोटल की यह क्षमता केवल उसी की है, इंसान में नहीं। परंतु जुलाई २०२६ के दो अध्ययनों ने कहा—नक्शा हमारे भीतर भी है।

पहला अध्ययन—PNAS, अप्रैल २०२६

यह अध्ययन वेक फॉरेस्ट विश्वविद्यालय के जोश करी, ड्यूक के डेविड ब्राउन और विस्कॉन्सिन के वैज्ञानिकों ने मिलकर किया। उन्होंने तीन जीव लिए—पानी में हाथ पुनर्जनित करने वाला एक्सोलोटल, पंख पुनर्जनित करने वाली ज़ेब्राफ़िश, और केवल उंगली की नोक पुनर्जनित कर सकने वाला चूहा।

उन्होंने घाव भरने के दौरान कौन-कौन से जीन सक्रिय होते हैं, यह देखा। तीनों जीवों में एक ही परिवार के दो जीन—SP6 और SP8—एक ही समय में सक्रिय हुए। ये जीन मुख्य नियामक अर्थात् ट्रांसक्रिप्शन फैक्टर हैं, जो सैकड़ों अन्य जीनों को निर्देश देते हैं।

प्रमाण क्या? उन्होंने CRISPR प्रौद्योगिकी का उपयोग करके एक्सोलोटल में SP8 जीन को हटा दिया। SP8 के बिना ब्लास्टेमा तो बन गया, पर पूरा हाथ नहीं बन सका; उंगलियाँ टेढ़ी-मेढ़ी रह गईं। अर्थात् SP8 हाथ पुनर्जनन में महत्वपूर्ण नियामक है।

दूसरा अध्ययन—Cell Reports, २८ जुलाई २०२६

इसका नाम था—"Conserved anterior/posterior tissue asymmetry encodes proximal/distal positional information during axolotl limb regeneration" (Trostle et al., 2026)।