पाकिस्तान सरकार द्वारा चीनी के सीमित निर्यात को मंजूरी दिए जाने के बाद देश में एक बार फिर चीनी की किल्लत और खुदरा कीमतों में भारी उछाल आने की आशंका पैदा हो गई है।
पाकिस्तान शुगर मिल्स एसोसिएशन (पीएसएमए) ने देश में लगभग 10.3 लाख टन चीनी का अतिरिक्त स्टॉक होने का दावा करते हुए 10 लाख टन निर्यात की अनुमति मांगी थी। इसके जवाब में आर्थिक समन्वय समिति (ईसीसी) ने सितंबर में 2 लाख टन चीनी निर्यात की मंजूरी दी, जिसे बाद में संघीय मंत्रिमंडल ने भी पारित कर दिया। स्टेट बैंक ऑफ पाकिस्तान ने इस निर्णय को लागू करने के लिए 2 अक्टूबर को दिशानिर्देश जारी किए और 13 अक्टूबर को मिलों के हिसाब से कोटा संशोधित किया।
हालांकि, आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उद्योग जगत के आंकड़ों पर भरोसा करके निर्यात की अनुमति देना जोखिम भरा साबित हो सकता है। पिछले साल भी पाकिस्तान ने लगभग 7.5 लाख टन चीनी का निर्यात किया था, जिसके बाद घरेलू बाजार में चीनी के दाम बढ़कर 180 से 200 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए थे। स्थिति को संभालने के लिए सरकार को अंतरराष्ट्रीय बाजार से महंगे दामों पर करीब 3 लाख टन चीनी का आयात करना पड़ा था।
चीनी उद्योग के कामकाज और पारदर्शिता पर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं। नवंबर 2020 में पाकिस्तान प्रतिस्पर्धा आयोग (सीसीपी) ने प्रतिस्पर्धा नियमों के उल्लंघन और कृत्रिम कमी पैदा करने के आरोप में पीएसएमए और 84 चीनी मिलों को कारण बताओ नोटिस जारी किया था। इसके अलावा, नवंबर 2025 में सीसीपी ने पंजाब की 10 चीनी मिलों को पेराई में देरी करने और गन्ने का खरीद मूल्य 400 रुपये प्रति मन तय करने के लिए सांठगांठ करने के आरोप में नोटिस थमाया था।
हालांकि मिल मालिकों का तर्क है कि निर्यात से मिलने वाली विदेशी मुद्रा से गन्ने के बकाये का भुगतान करने में मदद मिलेगी, लेकिन किसान अक्सर देरी से भुगतान और खरीदारों की सांठगांठ से प्रभावित होते रहे हैं। चीनी आम घरों से लेकर खाद्य उद्योग तक की बुनियादी आवश्यकता है, ऐसे में अगर आपूर्ति का आकलन गलत साबित हुआ, तो इसका सीधा बोझ एक बार फिर आम उपभोक्ताओं पर ही पड़ेगा।