सैन्य गतिविधियों और बारूदी संघर्षों ने वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र को विनाश के कगार पर धकेल दिया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा हर वर्ष 6 नवंबर को मनाए जाने वाले 'युद्ध एवं सशस्त्र संघर्ष में पर्यावरण के शोषण की रोकथाम के अंतरराष्ट्रीय दिवस' के अवसर पर विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि आधुनिक युद्ध केवल इंसानी जानें नहीं ले रहे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए हवा, पानी और मिट्टी को भी जहरीला बना रहे हैं।

अखिल भारतीय किसान महासंघ (आईफा) के राष्ट्रीय संयोजक एवं कृषि व ग्रामीण अर्थव्यवस्था विशेषज्ञ डॉ. राजाराम त्रिपाठी द्वारा उद्धृत आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 के एक वैश्विक अध्ययन से स्पष्ट हुआ है कि दुनिया की सेनाओं और उनकी आपूर्ति श्रृंखलाओं का कार्बन उत्सर्जन कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैसों का लगभग 5.5 प्रतिशत है। यदि वैश्विक सैन्य तंत्र को एक स्वतंत्र राष्ट्र मान लिया जाए, तो कार्बन उत्सर्जन के मामले में यह विश्व में चौथे स्थान पर होगा। इसके बावजूद सैन्य उत्सर्जन का कोई अनिवार्य वैश्विक लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है।

संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) की सितंबर 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, गाजा में मई 2025 तक 97.1 प्रतिशत वृक्ष फसलों, 82.4 प्रतिशत वार्षिक फसलों और 95.1 प्रतिशत झाड़ीदार वनस्पतियों को भारी नुकसान पहुंचा। वहां जल भंडारण और पंपिंग क्षमता में 84 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि 61 मिलियन टन से अधिक मलबा हटाने की चुनौती बनी हुई है, जिसमें विस्फोटक अवशेष, एस्बेस्टस और औद्योगिक रसायन शामिल हैं।

इसी तरह, 'नेचर' जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक यूक्रेन युद्ध के शुरुआती 18 महीनों में ही सैन्य गतिविधियों से लगभग 77 मिलियन टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य उत्सर्जन दर्ज किया गया। युद्ध के दौरान नष्ट हुए जंगलों की कार्बन सोखने की क्षमता खत्म हो जाती है, जबकि युद्ध के बाद पुनर्निर्माण में इस्तेमाल होने वाला सीमेंट और इस्पात अतिरिक्त पर्यावरणीय बोझ पैदा करता है।

UNEP के अनुसार, पिछले छह दशकों में कम से कम 40 प्रतिशत आंतरिक संघर्षों का सीधा संबंध प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बारूदी सुरंगों, दूषित नदियों और भारी धातुओं का प्रभाव दशकों तक बना रहता है। अब समय आ गया है कि युद्ध के नुकसान का आकलन केवल मौतों और आर्थिक क्षति तक सीमित न रखकर नष्ट हुए पारिस्थितिकी तंत्र, बढ़े हुए कार्बन उत्सर्जन और प्रदूषित जलस्रोतों के अनिवार्य हिसाब के साथ किया जाए।