दक्षिण एशिया में चीन की महत्वाकांक्षी 'बेल्ट एंड रोड पहल' (बीआरआई) के तहत जारी बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भारी वित्तीय घाटे, बढ़ते कर्ज और परिचालन संबंधी चुनौतियों के कारण गंभीर संकट का सामना कर रही हैं। ताइपे टाइम्स के विश्लेषण और नेपाल आज की रिपोर्ट के अनुसार, श्रीलंका के कोलंबो बंदरगाह में 39.2 करोड़ अमेरिकी डॉलर के लॉजिस्टिक्स हब विकसित करने की प्रस्तावित योजना से चीनी सरकारी स्वामित्व वाली कंपनी के अचानक पीछे हटने से बीजिंग की क्षेत्रीय रणनीति पर नए सिरे से सवाल उठने लगे हैं।

श्रीलंका की यह घटना पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र में चीनी निवेश वाली परियोजनाओं में व्याप्त गहरे संरचनात्मक तनाव को दर्शाती है। पाकिस्तान में चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) आर्थिक अस्थिरता, बिजली क्षेत्र के बकाया वित्तीय दायित्वों और बलूचिस्तान में चीनी नागरिकों व संपत्तियों पर हुए हमलों के कारण बढ़ती सुरक्षा लागत से बुरी तरह प्रभावित हुआ है।

वहीं नेपाल के मामले में कठिन भौगोलिक स्थिति, अत्यधिक निर्माण लागत, कम वित्तीय लाभ और सीमा पार परिवहन संचालन की जटिलताओं को प्रमुख बाधा के रूप में रेखांकित किया गया है। दूसरी ओर, बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल से विदेशी निवेश की निरंतरता प्रभावित होने की आशंका है, जबकि मालदीव भी दीर्घकालिक विदेशी कर्ज के बोझ से जूझ रहा है।

इन तमाम चुनौतियों से स्पष्ट होता है कि केवल राजनीतिक समझौतों के दम पर मेगा-प्रोजेक्ट सफल नहीं हो सकते। दक्षिण एशिया में बीआरआई की वास्तविक सफलता निवेश के आंकड़ों के बजाय इस बात पर निर्भर करेगी कि ये परियोजनाएं स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं को कितना व्यावहारिक आर्थिक लाभ और दीर्घकालिक व्यावसायिक स्थिरता प्रदान कर पाती हैं।