काठमांडू घाटी में हाल के दिनों में खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों को लेकर जनचिंता तेजी से बढ़ी है। विशेष रूप से त्योहारों और दैनिक जीवन में ऑनलाइन डिलीवरी सेवाओं और मिष्ठान भंडारों द्वारा आपूर्ति किए जाने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। इसी संदर्भ में 'नेपाल आज' ने नेपाली उपभोक्ताओं की परेशानियों और बासी तथा अखाद्य वस्तुओं की बिक्री व वितरण से जुड़े मुद्दे को उठाते हुए एक विशेष समाचार प्रकाशित किया था। उक्त समाचार में खाद्य सुरक्षा की वर्तमान स्थिति को स्पष्ट करने के लिए अतीत में चर्चा में रहे ऐतिहासिक दृष्टांतों को जोड़ा गया था। हालांकि, समाचार प्रकाशित होने के बाद उपभोक्ताओं से सीधे जुड़े खाद्य सेवा प्रदाताओं—पठाओ फूड्स, संगम स्विट्स और गौतम स्विट्स—द्वारा प्रदर्शित व्यवहार और संकट प्रबंधन की शैली पूरी तरह भिन्न और दिलचस्प देखने को मिली।
पठाओ फूड्स द्वारा गुपचुप राशि की वापसी ऑनलाइन फूड डिलीवरी प्लेटफॉर्म पठाओ फूड्स के मामले में ग्राहक को बासी और अखाद्य भोजन पहुंचाए जाने की शिकायत मिलने के बाद संस्थान ने आंतरिक रूप से तुरंत कदम उठाया। पठाओ ने पीड़ित ग्राहक की राशि गुपचुप तरीके से वापस कर वित्तीय क्षतिपूर्ति की प्राथमिक जिम्मेदारी तो पूरी कर दी, लेकिन अपनी व्यावसायिक गलती और सेवा में हुई गंभीर लापरवाही पर कोई औपचारिक सार्वजनिक प्रतिक्रिया या जवाबदेही दर्ज नहीं कराई। सेवा वितरण के दौरान हुई चूक को संस्थागत रूप से स्वीकार करने और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने की प्रतिबद्धता जताने के बजाय मौन रहकर रिफंड के जरिए मामले को दबाने के प्रयास ने उपभोक्ता के प्रति संस्थान की दीर्घकालिक जिम्मेदारी और पारदर्शिता पर सवाल खड़े किए हैं।
संगम स्विट्स की उपेक्षा और चुप्पी
इसी तरह, एक अन्य प्रतिष्ठित मिष्ठान भंडार संगम स्विट्स का रवैया और भी गैर-जिम्मेदाराना तथा उपेक्षापूर्ण रहा। दुकान से बासी और गुणवत्ताहीन मिठाइयों तथा खाद्य सामग्रियों की बिक्री को लेकर उपभोक्ताओं द्वारा लगातार शिकायतें और आरोप लगाए जाने के बावजूद संगम स्विट्स ने इस विषय को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया। अपनी गलतियों और कमियों पर न तो कोई सार्वजनिक खंडन जारी किया गया और न ही उपभोक्ताओं को आश्वस्त करने वाला कोई स्पष्टीकरण दिया गया। मीडिया और उपभोक्ताओं के सवालों की पूरी तरह अनदेखी करते हुए चुप्पी साधने का यह रवैया उपभोक्ता अधिकारों के सम्मान और पेशेवर नैतिकता के प्रति संस्थान की घोर उदासीनता को उजागर करता है।
गौतम स्विट्स का 50 लाख रुपये का क्षतिपूर्ति दावा
इस पूरे प्रकरण में सबसे विरोधाभासी और अजीब व्यवहार गौतम स्विट्स (टिपटॉप) ने दिखाया। समाचार में हालिया बासी खाना डिलीवरी के मुख्य संदर्भ में गौतम स्विट्स पर कोई नया आरोप नहीं लगाया गया था। समाचार में केवल खाद्य सुरक्षा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उपभोक्ता जागरूकता के लिए दशकों पहले घटी समोसे में चूहा मिलने की चर्चित घटना का उल्लेख किया गया था। लेकिन, प्रत्यक्ष रूप से दोषी न ठहराए जाने के बावजूद गौतम स्विट्स ने मामले को अनावश्यक रूप से बढ़ाते हुए कानूनी वकील के जरिए चेतावनी और कड़ा खंडन पत्र प्रस्तुत करने जैसे अति-प्रतिक्रियात्मक कदम उठाए। गौतम स्विट्स की ओर से अधिवक्ता दीपक राय के माध्यम से प्रस्तुत पत्र में 50 लाख रुपये के व्यापारिक नुकसान का दावा करते हुए प्रेस काउंसिल नेपाल में शिकायत दर्ज कराई गई।
प्रेस काउंसिल का स्पष्टीकरण पत्र और कानूनी स्थिति
उसी शिकायत के आधार पर प्रेस काउंसिल नेपाल ने 'नेपाल आज' को पत्र (पत्र संख्या 083/84, चलानी नं. 539) जारी कर एक दशक पुराने ऐतिहासिक संदर्भ को प्रकाशित करने के औचित्य, प्रमाण और निष्पक्षता पर स्पष्टीकरण मांगा है। दूसरी ओर, 'नेपाल आज' द्वारा अपने ऑनलाइन पोर्टल पर गौतम स्विट्स का खंडन पत्र शीघ्रता से प्रकाशित किए जाने के बाद, गौतम स्विट्स के कानूनी प्रतिनिधि अधिवक्ता दीपक राय ने स्वयं संपादक को संदेश भेजकर खंडन छापने के लिए आभार व्यक्त किया। बाद में इस संबंध में प्रतिक्रिया मांगे जाने पर अधिवक्ता राय ने बताया कि चूंकि यह मामला फिलहाल प्रेस काउंसिल में विचाराधीन है, इसलिए अभी और बोलना उचित नहीं होगा और उनकी प्राथमिकता काउंसिल के साथ समन्वय बनाकर कानूनी प्रक्रिया को तार्किक परिणति तक पहुंचाने की है।
व्यावसायिक जवाबदेही और संकट प्रबंधन का अभाव
खाद्य सुरक्षा और उपभोक्ता अधिकारों के प्रश्न पर इन तीनों बड़े व्यावसायिक घरानों की प्रतिक्रियाओं की तुलना करने पर नेपाली बाजार में संकट प्रबंधन और सामाजिक जिम्मेदारी का गंभीर अभाव स्पष्ट झलकता है। गलती करने वाला पठाओ फूड्स केवल रिफंड तक सीमित रहा, संगम स्विट्स ने सवालों को पूरी तरह खारिज कर दिया, और जिस पर आरोप ही नहीं था, वह गौतम स्विट्स कानूनी अड़चनें खड़ी कर आक्रामक हो गया। इससे यह सिद्ध होता है कि व्यावसायिक संस्थान अब भी उपभोक्ताओं के प्रति प्रत्यक्ष जवाबदेही के बजाय आत्मरक्षा और कानूनी दांव-पेंच पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। ऐसी स्थिति में मीडिया की सजगता और नागरिक स्तर पर निरंतर सतर्कता ही बाजार को मर्यादित और पारदर्शी बनाए रखने का मुख्य आधार है।
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